★ लकीरों से परे ★
ज़माने की बंदिशें, ये दीवारें, ये पहरे,
ज़ख्म दिए हैं दुनिया ने बहुत गहरे,
हक़ीक़त की धूप में शायद तू मेरा न हो सके,
पर ख़्वाबों के शहर में, बस तेरे ही चेहरे...!
किस्मत के लिखे को बदलना, मेरे बस में नहीं,
मगर धड़कनों पर हुकूमत सिर्फ तुम्हारी रहेगी,
निकाल दे तुझे दिल से कोई, ये किसी के बस में नहीं...!
तू लकीरों में नहीं तो क्या, मेरी दुआओं में है,
तू पास नहीं तो क्या, मेरी वफाओ में है,
रिश्ता ये रूहानी है, इसे जिस्मों की ज़रूरत क्या,
तेरा नाम मेरी हर एक वफ़ा की सदाओं में है...!
ये दुनिया लाख कोशिश कर ले हमें जुदा करने की,
ये रस्म, ये रिवाज, ये साज़िशें हमें फ़ना करने की,
मगर रूह से रूह का जो अटूट धागा बंध गया है,
मौत की भी मजाल नहीं, उस डोर को जुदा करने की...!
🌸 शुक्रिया 🌸
आपकी अपनी 🌹
अहसास डायरी 📕
● क्या आपको भी लगता है कि रूहानी रिश्ता जिस्मानी मौजूदगी से बड़ा होता है ?
● "किस्मत के लिखे" और "दिल की धड़कन" में से आप किसे ज्यादा ताकतवर मानते हैं ?
● क्या हकीकत से दूर ख्वाबों में किसी को अपना मान लेना सुकून देता है ?
● क्या समाज की दीवारें कभी दो रूहों के मिलन को रोक सकती हैं ?
● "तू लकीरों में नहीं तो क्या, दुआओं में है"—इस लाइन पर आपकी क्या राय है ?
● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।






1 Comments
Lovely
ReplyDeleteशब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
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