खुशी से जिया करती थी,
खुद में मस्त रहा करती थी,
मेरी खुशी मेरे दोस्तों को माना करती थी,
हर दुःख उस संग बांटा करती थी,
हर बात पर झगड़ा किया करती थी,
दुनियां भुला बैठी थी,
उसे हां उसे मैं अपनी दोस्त मान बैठी थी,
जिसकी मैं कभी दोस्त नहीं थी,
बेफिजुल आस लगा बैठी थी,
खुद को उसकी दोस्त समझ बैठी थी...!
(कैसे मान लूं, कैसे मान लूं)
उसका प्यार दिखावा था,
वो मेरी खुशी का एक मात्र सहारा था,
कैसे भुल जाऊ वो पल,
जिस पल में वो मेरी साथ रहा करती थी,
मुझे रोती देख खुद रोया करती थी,
मेरे लिए मुझसे ही लड़ जाया करती थी,
मेरी गलती मुझे बताती और हर बार समझाया करती थी,
खुद उदास होकर मुझे हंसाती थीं,
झगड़ती थी मनाती थी जिन्दगी में नई रंग भर जाती थी,
मेरे लिए नामुमकिन चीज कर जाती थी...!
(और अब कहती है वो सब दिखावा था)
कैसे मानु कैसे मानु ये बात,
वो मेरी दोस्त हैं पर मैं उसकी दोस्त नहीं,
उसे मेरी खुशी चाहिए जमाने का ताना नहीं,
शायद इसलिए आज वो मेरी दोस्त तो रही,
लेकिन मैं उसकी दोस्त नहीं,
दिल कहता है सब सच था कोई दिखावा नहीं,
उम्मीदें खत्म अब कोई सहारा नहीं,
सब कुछ है मेरे पास मम्मी पापा भाई बहन,
पर जिन्दगी को देखने का वो नजरिया नही....।
🌸 शुक्रिया 🌸
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
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