__________________________ तू ही मेरी इबादत

तू ही मेरी इबादत

 ★ तू ही मेरी इबादत ★

दोस्तों, आज की मेरी यह कविता 'तू ही मेरी इबादत' उस गहरे और सच्चे प्यार के बारे में है, जहाँ हमें अपना साथी ही अपनी पूरी दुनिया और इबादत जैसा लगने लगता है। जब किसी का साथ मिल जाता है, तो जीवन की हर मुश्किल आसान लगने लगती है।

इस कविता में मैंने उन अहसासों को लिखा है, जहाँ हमारा प्यार ही हमारी ताकत और सुकून बन जाता है। यह कविता उस श्रद्धा और अपनापन को दिखाती है जो एक मजबूत रिश्ते के लिए बहुत ज़रूरी है।

अगर आप भी किसी से बहुत प्यार करते हैं और उसे ही अपनी प्रार्थना मानते हैं, तो यह कविता आपको बहुत पसंद आएगी। इसे पूरा ज़रूर पढ़ें...!

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मैं ढूँढूँ दुनिया में खुद को,

जैसे कोई पर्वत खड़ा,

तू मिल जाए तो लगता है,

मेरा सफर बस अब है बढ़ा,

वो पत्थर जैसी सीने की धड़कन,

तुझसे ही मचलती है,

तेरे आँचल की छाँव मिले तो,

रूह मेरी संभलती है,

तू है सुकून मेरा,

तू ही है मेरा हर रास्ता,

तू शक्ति मेरी,

तू ही मेरी श्रद्धा का वास्ता...!

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सजे हों छप्पन भोग भले,

महकती हो ये थालियाँ,

तेरे बिना फीकी लगती हैं,

ये सब रंग-बिरंगी खुशियाँ,

जैसे कान्हा को तुलसी भाए,

बिन उसके भोग अधूरा है,

तेरा साथ न हो जो साथ मेरे,

तो जग ये सब कोरा है,

तू सावन की पहली बूंद,

मैं प्यासी जमीं का रास्ता,

तू शक्ति मेरी,

तू ही मेरी श्रद्धा का वास्ता...!

~~~~~🙏~~~~~

दुनिया की तलवारें लेकर,

मैंने तो जग को जीत लिया,

पर तुझसे जो एक लफ्ज़ सुना,

मैंने खुद को जीत लिया,

बड़े-बड़े सम्राट झुके,

जो तेरी आँखों के आगे,

जीत का असली गहना तो,

बस तेरी सादगी में जागे,

तू ही मेरी जीत की मंजिल,

तू ही मेरा इकलौता राब्ता,

तू शक्ति मेरी,

तू ही मेरी श्रद्धा का वास्ता...!

~~~~~🙏~~~~~

एक तू है, जो कर्म की राह में,

मेरी ढाल बन जाती है,

एक मैं हूँ, जो श्रद्धा में तेरी,

खुद को भूल जाता हूँ,

ये सृष्टि की जो डोरी है,

तूने ही तो ये बुनी है,

तू न हो तो मौन धरा,

तू हो तो भोर की सुबह है,

तू ही मेरी इबादत है,

तू ही मेरी प्रार्थना का वास्ता,

तू शक्ति मेरी,

तू ही मेरी श्रद्धा का वास्ता...!

~~~~~🙏~~~~~

👉 शुक्रिया 👈

आपकी अपनी 🌹 

Ahasas Dayri 📕

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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-

इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में पाठकों के लिए कुछ सवाल हैं:-

● कवि ने अपनी 'शक्ति' किसे माना है और उनके होने से कवि के जीवन में क्या बदलाव आता है ?

● 'छप्पन भोग' और 'तुलसी' के उदाहरण से कवि क्या कहना चाहता है ?

● 'दुनिया को जीतना' और 'खुद को जीतना' - इन दोनों में कवि के लिए ज्यादा जरूरी क्या है और क्यों ?

● कठिन समय में 'ढाल' बनने से कवि का क्या अर्थ है ?

● यह कविता पढ़ने के बाद आपको कैसा महसूस हुआ ? क्या आपको लगा कि यह किसी खास के प्रति समर्पित है ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।

लेखिका की कलम से(निष्कर्ष):-

संक्षेप में कहें तो, यह कविता उस निस्वार्थ प्रेम और गहरी आस्था की एक सुंदर अभिव्यक्ति है, जहाँ प्रेमी अपने प्रिय को ही अपना सब कुछ, अपना रास्ता और अपनी प्रार्थना मान लेता है। 'तू ही मेरी इबादत' केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि उस गहरे जुड़ाव का प्रतीक है जो किसी के साथ होने पर दुनिया की हर मुश्किल को आसान कर देता है।

यह कविता हमें याद दिलाती है कि जीवन की असली जीत बाहरी दुनिया को जीतने में नहीं, बल्कि अपने प्रिय के दिल में अपनी जगह बनाने और उनके प्रति पूर्ण समर्पण में निहित है। उम्मीद है कि इस कविता के भावों ने आपके भीतर भी प्यार और आदर के उन कोमल अहसासों को जगाया होगा, जिन्हें हम अक्सर व्यक्त नहीं कर पाते। यदि आपके जीवन में भी कोई ऐसा है जो आपकी 'इबादत' के समान है, तो उनके साथ अपने इन ख्यालों को जरूर साझा करें।

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