__________________________ तक़दीर की कलम

तक़दीर की कलम

★ तकदीर की कलम ★

अपनी तकदीर के हर बादल मैं ही लिखूँगी,

अपनी हिम्मत का वो पागलपन मैं ही लिखूँगी,

ज़मीन पर जो बिछड़ गए, वो रास्ते पुराने थे,

अब बादलों के ऊपर अपना सिंहासन मैं ही लिखूँगी...!

माना कि ज़िंदगी तेरे बिना अधूरी रहेगी,

पर इस कमी को अपनी मजबूरी न लिखूँगी,

तू नहीं है साथ, तो क्या हुआ ऐ हमसफ़र,

मैं अपनी जीत का अब नया जश्न लिखूँगी...!

काली घटाओं को चीर कर जो धूप निकलेगी,

उस सुनहरी चमक का दर्शन मैं ही लिखूँगी,

फाड़ दिए वो पन्ने जिनमें मैं हारी हुई थी,

अब ऊँचाइयों पर अपनी धड़कन मैं ही लिखूँगी...!

तू हिस्सा था गुज़रे हुए कल का,

अब आने वाले कल का अभिनंदन मैं ही लिखूँगी,

आसमान गवाह है, मेरी उड़ान का,

अपनी जीत का हर बादल मैं ही लिखूँगी...!




🌸 शुक्रिया 🌸 


आपकी अपनी 🌹 

अहसास डायरी 📕


● क्या आप भी अपनी तकदीर खुद लिखने में यकीन रखते हैं ?


● इस कविता को पढ़कर आपके मन में क्या शब्द आया ? (जैसे: हिम्मत, जीत या उड़ान)


● क्या पुरानी बातों को भूलकर आगे बढ़ना ही असली जीत है ?


● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।

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