दोस्तों, आज की मेरी यह कविता 'चेहरे का लिबास' उन भावनाओं को बयां करती है जिन्हें हम अक्सर एक झूठी मुस्कान के पीछे छिपा लेते हैं। हम सब कभी न कभी दुनिया को खुश करने या खुद को मजबूत दिखाने के लिए एक नकाब पहन लेते हैं, जबकि अंदर ही अंदर हम बहुत दर्द और तन्हाई से गुजर रहे होते हैं। शोर-शराबे वाली इस दुनिया में अपनी असलियत को छिपाना एक आदत सी बन गई है। इस कविता के जरिए मैंने अपनी उन्हीं दबी हुई भावनाओं को शब्दों का रूप देने की कोशिश की है, जो दुनिया की भीड़ में अक्सर कहीं खो जाती हैं। उम्मीद है कि हकीकत और दिखावे के बीच की यह कहानी आपके दिल को ज़रूर छुएगी...!
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दुनिया को दिखाने को चेहरे पर नक़ाब है,
मेरे अंदर एक दरिया-ए-दर्द बेहिसाब है,
झाँक कर जो देखोगे, रूह कांप जाएगी,
हर सांस में एक अनकही प्यास उभर आएगी...!
खुदा! अब तो सब्र का पैमाना भर गया है,
सीने में दबा दर्द, एक पत्थर सा ठहर गया है,
ये वो ज़हर है जिसे ख़ामोशी से पीते हैं हम,
तन्हाइयों के साये में, रोज़ ही जीते हैं हम...!
परछाई से भी अब तो डरने लगे हैं ख़ुद से,
राहत की तलाश में, गुज़रते हैं मुद्दत से,
ख्वाहिश थी कि परिंदों सी ऊँची उड़ान भरूँ,
ज़िंदगी की कड़वाहट को हंसी में बदलूँ...!
मगर यादों की धूल ने रास्तों को घेर लिया है,
मायूसी की धूप ने खुशियों को फेर लिया है,
वो सावन के रंगों सा, रूह में समाया जो था,
जिसने खिलती कलियों सा, मन को सजाया जो था...!
ऐ खुदा! उस मुसाफिर को मेरी बंजर ज़मीं पर ला दे,
मेरी फीकी पड़ी रूह में, फिर से रंग सजा दे,
बहुत भारी है ये हँसी, अब ये बोझ सहा न जाए,
मेरी खाली झोली में, वो ख़ुशियाँ फिर लौट आए...!
👉 शुक्रिया 👈
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-
इस कविता को लिखने के बाद,मेरे मन में कुछ सवाल आए हैं:-
● क्या आपने कभी ऐसा नकाब पहना है ?
● क्या आप भी खामोशी से दर्द सहते हैं ?
● तन्हाई आपको क्या सिखाती है ?
● क्या खुशी का दिखावा सच में भारी है ?
● क्या आपके पास भी ऐसी कोई याद है ?
● क्या आपको भी किसी अपने की तलाश है ?
● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।
लेखिका के कलमसे (निष्कर्ष):-
अंत में, यह 'चेहरे का लिबास' केवल एक आवरण नहीं है, बल्कि यह वह बोझ है जिसे हम दिन-रात ढोते हैं। कभी-कभी खुद को दुनिया के सामने सही दिखाने की कोशिश में, हम अपनी असल पहचान और खुशी को कहीं खो देते हैं। इस कविता के माध्यम से मेरा प्रयास यही था कि मैं उस दर्द को एक भाषा दे सकूँ, जिसे हम अक्सर अपनी तन्हाई के सायों में अकेले ही पीते हैं। याद रखिए, कभी-कभी नकाब उतारकर अपनी भावनाओं को स्वीकार कर लेना ही खुद को फिर से पाने की पहली सीढ़ी होती है। उम्मीद है कि मेरी ये पंक्तियाँ आपको अपनों के सामने या कम से कम खुद के सामने सच बोलने का साहस देंगी।
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1 Comments
मेरी दुनिया वही तक खूबसूरत हैं,
ReplyDeleteजहाँ तक तुम मेरे साथ हो...!😊
शब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
अपने विचार लिखिए 🤔
अपने अहसास शेयर कीजिए 🤝🤗
अपना आशीर्वाद दीजिए 🙌