★ दिखावे का मेला - विवाह ★
यह मिलन है दो रूहों का,
या बाज़ार की मंडी है ?
आजकल की हर शादी में,
दिखावे की गूँज तगड़ी है,
लाखों लुटाकर कार्ड छपे,
सजे फूलों से द्वार हैं,
पर रिश्तों की नींव में देखो,
खोखलेपन के तार हैं...!
दहेज को 'हक' का नाम देकर,
मांगते बड़ी शान से,
जो खुद को ऊँचा बताते हैं,
वो दूर अपनी पहचान से,
वह मंडप की चमक-धमक,
और रोशनी का शोर है,
किराए के इन मेहमानों का,
जमा हुआ यह दौर है...!
प्री-वेडिंग के फोटोशूट में,
बस इश्क का अभिनय होता है,
कैमरे के सामने चेहरा,
हँसता और मुस्कुराता होता है,
दहलीज घर की लांघते ही,
सब रंग फीके पड़ जाते हैं,
सोशल मीडिया की चमक में,
असली दर्द छुप जाते हैं...!
दिखावे की इस दौड़ में,
सादगी कहीं खो गई,
रिश्तों की रूह मर चुकी,
रस्में बस औपचारिकता हो गई,
करोड़ों फूँक कर भी यहाँ,
सुकून कहीं न मिलता है,
क्योंकि दिखावे का ये जहर,
हर रिश्ते को छलता है...!
सोचो ज़रा ऐ इंसान तुम,
क्या ये सब ज़रूरी है ?
दिखावे की इस चमक में,
रिश्तों की तबाही पूरी है,
फालतू के इन खर्चों को,
अगर अपनों पर लगाया जाए,
तो सादगी के उस बंधन में,
उम्र भर का साथ पाया जाए...!
👉 शुक्रिया 👈
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
मेरी बाकी कविताएँ पढ़ने के लिए [यहाँ क्लिक करें]।
कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-
इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में कुछ सवाल हैं जिसका जवाब आपके पास है:-
● आधुनिक शादियों में 'प्यार' से ज़्यादा ज़रूरी क्या हो गया है ?
● क्या भारी दिखावा और फिजूलखर्ची रिश्तों की नींव को मजबूत करते हैं या कमजोर ?
● सोशल मीडिया और फोटोशूट के दौर में शादियों की असली खुशी कहाँ खो गई है ?
● दहेज को 'हक' कहना हमारी सोच के किस पहलू को दर्शाता है ?
● दिखावे को छोड़कर शादियों को और बेहतर और सुखद कैसे बनाया जा सकता है ?
● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।
अगर आप मेरी पुरानी कविता पढ़ना चाहते हैं, तो [यहाँ क्लिक करें]।
निष्कर्ष(Conclusion):-
'दिखावे का मेला - विवाह' कविता आज के दौर में शादियों के बदलते स्वरूप और उसके पीछे छिपे खोखलेपन पर एक गहरा प्रहार है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि विवाह, जो दो रूहों का एक पवित्र मिलन होना चाहिए था, वह अब केवल एक दिखावे की मंडी बनकर रह गया है। भारी-भरकम खर्चों, प्री-वेडिंग फोटोशूट और सोशल मीडिया की चकाचौंध के बीच कहीं न कहीं रिश्तों की असल सादगी और सुकून ओझल हो गए हैं। अंततः, यह कविता हमें आत्म-चिंतन करने के लिए प्रेरित करती है कि दिखावे की इस दौड़ में हम कहीं न कहीं रिश्तों की नींव को ही कमजोर कर रहे हैं। यदि हम फिजूलखर्ची और बाहरी प्रदर्शन को छोड़कर सादगी को अपनाएं, तो ही हम विवाह के उस पवित्र बंधन को उम्र भर के लिए सुरक्षित और यादगार बना पाएंगे।

4 Comments
Shadi ka such 💯correct
ReplyDelete😅
ReplyDeleteTrue
ReplyDeleteSahi bat
ReplyDeleteशब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
अपने विचार लिखिए 🤔
अपने अहसास शेयर कीजिए 🤝🤗
अपना आशीर्वाद दीजिए 🙌