__________________________ आखिरी खत और वो पुरानी घड़ी

आखिरी खत और वो पुरानी घड़ी

आखिरी खत और वो पुरानी घड़ी

यह कहानी किसी काल्पनिक भूत या आत्मा की नहीं, बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा डरावने उस सच की है, जिसे इंसान अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में पीछे छोड़ देता है—अकेलापन और अपनों की बेरुखी। यह कहानी है मेरे दादाजी, श्रीनाथ शर्मा, और उनके उस पुराने घर की, जहाँ की हर एक ईंट में इंतज़ार और दर्द की एक गहरी दास्तान छुपी हुई थी।

शहर की चकाचौंध और कॉरपोरेट की नौ-से-पाँच वाली नौकरी में जब मेरा दम घुटने लगा, तो मैंने फैसला किया कि कुछ दिन अपने पुश्तैनी शहर में बिताऊँगा। हमारे दादाजी का वह पुराना मकान शहर के एक शांत और पुराने मोहल्ले में था। जब मैं वहाँ पहुँचा, तो घर पर ताला लगा था। बड़े पापा और बाकी के चाचा-ताऊ सब शहर के बड़े इलाकों में या विदेश में बस चुके थे। दादाजी के निधन के बाद से वह घर वीरान पड़ा था।

जब मैंने पुराना जंग लगा ताला खोला, तो अंदर दाखिल होते ही धूल और पुरानी किताबों की एक भारी सी महक ने मेरा स्वागत किया। घर का सामान वैसे का वैसा ही था। ऐसा लग रहा था मानो समय वहीं किसी कोने में थम गया हो। दीवारों पर टँगी घड़ियाँ बंद थीं, और हवा में एक अजीब सा ठहराव था।

मैंने तय किया कि जब तक मेरा वर्क-फ्रॉम-होम चल रहा है, मैं इसी घर से काम करूंगा। मुझे लगा कि यह शहर की भागदौड़ से दूर एक शांत जगह होगी, जहाँ सुकून मिलेगा। लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि यह सुकून धीरे-धीरे एक भारी सन्नाटे में बदल जाएगा।

ठहरी हुई घड़ियाँ और अजीब सी आहटें

शुरुआती दो-तीन दिन बहुत अच्छे बीते। मैंने घर की साफ-सफाई की, खिड़कियाँ खोलीं ताकि ताज़ी हवा अंदर आ सके और धूप कमरों तक पहुँच सके। लेकिन जैसे ही शाम ढलती और रात अपनी चादर ओढ़ती, घर का माहौल पूरी तरह बदल जाता।

घर के ड्राइंग रूम में दादाजी की एक पसंदीदा पुरानी एंग्लो-जर्मन दीवार घड़ी थी। वह बहुत साल पहले खराब हो चुकी थी और उसके पेंडुलम ने चलना बंद कर दिया था। उस घड़ी की सुइयाँ हमेशा रात के ठीक नौ बजकर पंद्रह मिनट पर रुकी रहती थीं।

पहले दिन जब रात के ठीक नौ बजकर पंद्रह मिनट हुए, तो अचानक उस बंद पड़ी घड़ी से टिक-टिक की आवाज़ आने लगी। उस सन्नाटे में वह आवाज़ इतनी तेज़ और गूँजती हुई थी कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने चौंककर उस घड़ी की तरफ देखा। उसका पेंडुलम जो सालों से स्थिर था, अब एक अजीब सी लय में बाएँ-दाएँ झूल रहा था।

मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मैंने खुद को समझाया कि शायद यह लकड़ी के पुराने होने की वजह से तापमान में बदलाव का असर हो या फिर किसी चूहे की हरकत। मैंने हिम्मत करके उठकर घड़ी को छूने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही मैंने हाथ बढ़ाया, वह आवाज़ अचानक बंद हो गई और पेंडुलम फिर से अपनी पुरानी जगह पर स्थिर हो गया।

मगर रात ठीक उसी समय—नौ बजकर पंद्रह मिनट पर—वही घटना दोबारा हुई। इस बार केवल घड़ी नहीं चली, बल्कि बरामदे में किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। छप-छप... छप-छप... जैसे कोई पुरानी लकड़ी की चप्पल पहनकर धीरे-धीरे चल रहा हो।

मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया और बिस्तर पर दुबक गया। उस रात मुझे ठीक से नींद नहीं आई। मन में हजारों सवाल और एक अजीब सा अनजाना खौफ घर कर गया था।

वह कमरा और बक्सा

चौथे दिन मैंने हिम्मत जुटाई और दादाजी के उस निजी कमरे में जाने का फैसला किया, जहाँ वे अपने आखिरी दिनों में ज्यादातर वक्त बिताया करते थे। वह कमरा हमेशा बंद रहता था। जब मैंने उसकी कुंडी खोली, तो चूहों और दीमक की गंध के साथ एक अजीब सी उदासी हवा में तैरने लगी।

कमरे के बीचों-बीच एक पुराना लकड़ी का बक्सा रखा था। उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी। मैंने खाँसते हुए उस बक्से को खोला। उसके अंदर ढेर सारी पुरानी चिट्ठियाँ, कुछ तस्वीरें और दादाजी की डायरियाँ रखी थीं।

मैंने जब उन चिट्ठियों को उठा कर पढ़ना शुरू किया, तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। वे चिट्ठियाँ किसी और की नहीं, बल्कि मेरे अपने पिता और मेरे बड़े चाचाओं की थीं, जो उन्होंने पिछले दस सालों में दादाजी को लिखी थीं। या यूँ कहें कि वे चिट्ठियाँ लिखी तो गई थीं, लेकिन उन पर एक भी डाक टिकट नहीं था और न ही वे कभी भेजी गई थीं। वे केवल कोरे कागजों पर लिखे गए वादे थे—

"पापा, इस बार दिवाली पर पक्का आऊँगा। बच्चों की छुट्टियाँ शुरू होते ही हम सब साथ में शहर आएँगे।"

"पिताजी, बिजनेस में थोड़ा नुकसान हो गया है, इस महीने पैसे नहीं भेज पाऊँगा। अपना ख्याल रखिएगा।"

लेकिन उन चिट्ठियों के नीचे एक डायरी का पन्ना खुला था, जिस पर दादाजी की काँपती हुई लिखावट में लिखा हुआ था—

"आज फिर कैलेंडर बदल गया। साल बीत गया, पर कोई मिलने नहीं आया। सब अपने परिवारों में व्यस्त हैं। फोन की घंटी हफ्तों नहीं बजती। कम से कम यह पुरानी घड़ी ही सही, यह तो याद दिलाती है कि आज भी कोई है जो मेरा इंतज़ार कर रहा है...या शायद मैं ही खुद का इंतज़ार कर रहा हूँ।"

उस डायरी के शब्दों ने मेरे सीने पर किसी भारी हथौड़े की तरह वार किया। मुझे अचानक सब कुछ समझ आ गया। वह कोई भूतिया साया नहीं था, वह किसी आत्मा का डर नहीं था—वह एक बूढ़े बाप का वह अधूरा इंतज़ार और कसैला अकेलापन था, जो इस घर की दीवारों में गूँजता रहता था।

दादाजी अपनी जिंदगी के आखिरी सालों में पूरी तरह अकेले रह गए थे। हम सबने उन्हें सुख-सुविधाएँ तो बहुत दी थीं, पैसे भेजे थे, बड़े-बड़े घरों में कमरे ऑफर किए थे, लेकिन किसी ने उन्हें वह समय और अपनापन नहीं दिया, जिसके वे असल में हकदार थे। उनका वह अकेलापन इस घर की हवा में इस तरह घुल चुका था कि हर शाम, हर रात वह दर्द किसी खौफ की शक्ल में बाहर आ जाता था।

खौफ और ज़ज्बात का मिलन

उस रात जब घड़ी ने फिर से नौ बजकर पंद्रह मिनट पर टिक-टिक करना शुरू किया, तो मुझे डर नहीं लगा। इस बार मेरी आँखों में आँसू थे। मैंने अपने कमरे से बाहर निकलकर सीधे उस ड्राइंग रूम की तरफ कदम बढ़ाया।

रात का सन्नाटा चीख रहा था। बरामदे में वही कदमों की आहट आ रही थी। मैंने देखा कि धुंधली सी रोशनी में कोई परछाई उस बंद घड़ी के सामने आकर खड़ी है। वह मेरे दादाजी की परछाई थी—झुका हुआ शरीर, काँपते हाथ और चेहरे पर गहरी झुंझलाहट और अकेलेपन का दर्द।

मेरा गला सूख गया था। मेरे पैर काँप रहे थे, लेकिन इस बार डर के मारे नहीं, बल्कि अपराध बोध के कारण। मैंने भारी कदमों से आगे बढ़कर उस साये के बिल्कुल करीब जाकर खुद को रोक लिया।

मैंने भारी आवाज़ में कहा, "दादाजी... मैं आ गया हूँ।"

वह परछाई अचानक रुकी। धीमी सी आहट के साथ वह साया मुड़ा। उसकी धुंधली आँखों में एक अजीब सी चमक और हैरानी थी।

"तुम... तुम कब आए, बेटा?" दादाजी की वह दबी हुई, काँपती हुई आवाज़ सीधे मेरे दिल पर लगी। वह आवाज़ उस पुराने कुएँ जैसी गहरी थी, जिसमें कई सालों से कोई झाँका नहीं था।

"मैं बहुत पहले आ जाना चाहिए था, दादाजी," मेरी आवाज़ रुँध गई और मेरे मुँह से सिसकी निकल पड़ी। मैं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गया, ठीक उसी तरह जैसे कोई बच्चा अपनी गलती की माफी माँगने के लिए बैठता है। "हम सब आपको भूल गए थे। हमने मान लिया था कि पैसे भेज देना ही हमारी जिम्मेदारी है। हमें माफ कर दीजिए।"

मेरे वे शब्द उस घर के सन्नाटे में बिखर गए। मैंने महसूस किया कि वह ठंडापन, वह सिहरन जो इन दीवारों में थी, वह धीरे-धीरे पिघल रही थी। दादाजी का वह साया मेरे सामने झुका और उनके ठंडे, पारदर्शी हाथों ने मेरे सिर को वैसे ही सहलाया, जैसे वे बचपन में मेरे बाल याया करते थे।

"कोई गिला नहीं है, बेटा," उनकी आवाज़ अब शांत और हल्की हो चुकी थी, जैसे किसी बड़े झरने का पानी समंदर में मिलकर शांत हो जाता है। "बाप को अपने बच्चों से कोई शिकायत नहीं होती। बस... इंसान का दिल जब भर जाता है, तो पुरानी दीवारें भी बोलने लगती हैं। तू आ गया, मेरा इंतज़ार पूरा हो गया।"

सुबह की एक नई सुबह

जब अगली सुबह खिड़की से सूरज की पहली सुनहरी किरण अंदर आई, तो घर का तापमान बिल्कुल सामान्य हो चुका था। वह भारीपन, वह घुटन और सड़े हुए पत्तों जैसी महक पूरी तरह गायब हो चुकी थी।

मैंने उठकर उस पुरानी एंग्लो-जर्मन दीवार घड़ी को देखा। उसकी सुइयाँ अभी भी नौ बजकर पंद्रह मिनट पर रुकी थीं, लेकिन इस बार उस घड़ी में कोई अजीब सी सिहरन नहीं थी। वह अब एक शांत, सजी हुई विरासत लग रही थी।

मैंने अपने फोन उठाया और अपने पिता को वीडियो कॉल मिलाई। घंटी बजने के बाद जब स्क्रीन पर पिताजी का चेहरा आया, तो मैंने बिना किसी गुस्से के, बहुत प्यार से कहा— "पापा, इस बार छुट्टियाँ मत रद्द करना। हम सब मिलकर इसी पुराने घर में दादाजी के साथ... नहीं, दादाजी की यादों के साथ दिवाली मनाएंगे।"

पिताजी की तरफ से कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। स्क्रीन पर मैंने देखा कि पिताजी की आँखें नम हो गई थीं। उन्होंने बिना कुछ कहे बस अपना सिर हिला दिया।

मैंने डायरी उठाई और बाहर बरामदे में आकर बैठ गया। सामने धूप खिली हुई थी, और देवदार के पेड़ों से ठंडी हवा बह रही थी। मुझे अब उस घर में कोई डर नहीं लगता था। क्योंकि मुझे समझ आ गया था कि दुनिया के सबसे डरावने भूत हमारे अपने ही छोड़े हुए रिश्ते और किसी का अकेलापन होते हैं, जिन्हें सिर्फ एक बार गले लगाने और अपना कहने की जरूरत होती है।

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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-

● क्या आपने कभी अपने बुजुर्गों को इस तरह अकेला महसूस कराया है ?

● क्या पैसे भेजना वाकई अपनों के प्यार और समय का विकल्प हो सकता है ?

● क्या आपने कभी अपने किसी पुराने घर में अजीब अकेलापन महसूस किया है ?

● इस कहानी का कौन सा हिस्सा आपको सबसे ज्यादा भावुक कर गया ?

● क्या आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अपनों को भूलते जा रहे हैं ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें। 

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