__________________________ मर्यादा में औरत ही नहीं, मर्द भी अच्छा लगता है

मर्यादा में औरत ही नहीं, मर्द भी अच्छा लगता है


 ★ मर्यादा में औरत ही नहीं
मर्द भी अच्छा लगता है ★

दोस्तों, आज कीकी मेरी यह कविता 'मर्यादा में औरत ही नहीं, मर्द भी अच्छा लगता है' उस गहरे विषय को समर्पित है जिसे अक्सर हम अनदेखा कर देते हैं—हमारा आचरण। समाज में अक्सर मर्यादा का अर्थ केवल नारी से जोड़ दिया जाता है, लेकिन सच्चा बड़प्पन वही है जहाँ शक्ति और संयम का मेल हो। यह कविता उन जज्बातों का निचोड़ है, जहाँ पुरुष अपनी ताकत को अकड़ में नहीं, बल्कि अपनों की ढाल बनने में दिखाता है। इसका मतलब यह नहीं कि मर्यादा में रहना कमजोरी है, बल्कि यह वह निस्वार्थ संस्कार है जो रिश्तों को मजबूती देता है और चरित्र को एक नया आसमान देता है। उम्मीद है, यह कविता उन अनकहे गुणों को बयां कर पाएगी, जो शब्दों से ज्यादा हमारे व्यवहार में महसूस किए जाते हैं...!

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सिर्फ कड़वा बोलने से,

कोई मर्द नहीं होता,

बिना दया और प्रेम के,

कोई दर्द नहीं होता,

अपनी ताकत को जो,

औरों की ढाल बना देता है,

वो हारते हुए रिश्तों में भी,

जान बसा देता है,

मर्द का बड़प्पन उसकी,

अकड़ में कभी नहीं होता,

वो तो उसकी बातों के,

सुकून और सादगी में होता है,

जब संयम का हाथ पकड़कर,

कोई राहों पर चलता है,

मर्यादा में औरत ही नहीं,

मर्द भी अच्छा लगता है...!

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नजरों में नूर और बातों में,

शहद जैसा लहजा हो,

इंसान वही है जिसका चरित्र,

सागर जैसा गहरा हो,

जो नारी के सम्मान को,

अपनी खुद्दारी समझता है,

वही तो है वो चिराग जो,

अंधेरों में भी जलता है,

सच्चाई के उस आइने में,

जब चेहरा उसका दिखता है,

मर्यादा में औरत ही नहीं,

मर्द भी अच्छा लगता है...!

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बाहर की ताकत से ज्यादा,

मन की शक्ति बड़ी है,

जो औरतों की इज़्ज़त को,

अपनी इज़्ज़त मानता है,

वही असल में इस दुनिया की,

हकीकत जानता है,

सलीके से जो पेश आए,

वो हर दिल में बसता है,

मर्यादा में औरत ही नहीं,

मर्द भी अच्छा लगता है...!

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रिश्तों की कद्र करना,

ही असली मर्दानगी है,

संस्कारों को साथ रखना,

ही सच्ची दीवानगी है,

जो अपनी हदों में रहकर,

सबको सम्मान देता है,

वही अपनी पहचान को,

एक नया आसमान देता है,

सलीका हो अगर जीने का,

तो हर कोई जचता है,

मर्यादा में औरत ही नहीं,

मर्द भी अच्छा लगता है...!

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👉 शुक्रिया 👈

आपकी अपनी 🌹 

अहसास डायरी 📕

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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-

इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में पाठकों के लिए कुछ सवाल हैं:-

● आपके अनुसार एक पुरुष की असली पहचान उसकी 'अकड़' में है या उसके 'व्यवहार और संयम' में ?

● क्या अपनी ताकत को दूसरों की 'ढाल' बनाना ही सबसे बड़ा बड़प्पन है ?

● 'कड़वा बोलने' और 'सुकून देने वाली बात' में से आप किसे व्यक्तित्व की असली ताकत मानते हैं ?

● क्या मर्यादा सिर्फ औरतों के लिए है, या पुरुषों के लिए भी यह उतनी ही जरूरी है ?

● क्या संस्कारों के साथ अपनी 'हदों' में रहना इंसान को एक नया आसमान देता है ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।

निष्कर्ष (Conclusion):-

यह कविता हमें यह अहसास दिलाती है कि किसी भी रिश्ते की खूबसूरती और समाज की मर्यादा के लिए दोनों पक्षों का गरिमापूर्ण होना आवश्यक है। पुरुष का असली बड़प्पन उसकी कठोरता में नहीं, बल्कि उसकी कोमलता और दूसरों को सुरक्षा का अहसास देने में है। जो पुरुष अपने आचरण, अपनी भाषा और अपने संस्कारों से दूसरों के दिलों में जगह बनाता है, वही वास्तव में मर्यादा का असली वाहक है। यह कविता हमें इस विचार पर सोचने के लिए मजबूर करती है कि जब 'मर्द' अपनी शक्ति को दूसरों की ढाल बनाता है और विनम्रता को अपना आभूषण, तभी वह अपने सही अर्थों में महान कहलाता है।

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3 Comments

  1. Preeti baghel4 May 2026 at 21:23

    मर्यादा पुरुषों के लिए भी जरूरी है औरत ही क्यूँ मर्यादा में रहें।

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  2. Preeti baghel4 May 2026 at 21:24

    Beautiful poetry ✨️

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  3. बिल्कुल सही बात है

    ReplyDelete

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