★ बर्दाश्त करने की हद ★
मैं वो दीवार थी,
जो सबको छत देती रही,
सबकी खुशियों की खातिर,
अपनी खुशियां देती रही,
मैंने हर ग़म को छुपाया,
एक मुस्कान के पीछे,
पर आज जो गिर गई हूँ मैं,
अपनी ही नजरों में,
तो समझ लेना कि बर्दाश्त,
करने की हद खत्म हो गई है...!
मैं वो बेटी, वो बहन,
वो दोस्त बनी रही,
जो अंदर से टूटकर भी,
सबके लिए खड़ी रही,
कभी किसी ने पूछा नहीं,
मैं अंदर से कैसी हूँ,
सबने बस यही देखा,
कि मैं बाहर से कैसी हूँ,
पर आज जो टूटी हूँ मैं,
एक सूखे पत्ते की तरह,
तो समझ लेना कि बर्दाश्त,
करने की हद खत्म हो गई है...!
बहुत वक़्त तक चुप रही,
कि कोई बुरा न माने,
सबकी खुशियाँ ढूँढती रही,
खुद को बिना जाने,
मगर अब थक गई हूँ मैं,
ये बोझ उठाते-उठाते,
पर अब जो बह निकले हैं,
ये आँसू बेहिसाब,
तो समझ लेना कि बर्दाश्त,
करने की हद खत्म हो गई है...!
अब और नहीं है हिम्मत,
कि कोई झूठ बोलूँ,
आँखों के इन आँसुओं को,
मुस्कुराहट में घोलूँ,
अगर आज रो पड़ी हूँ मैं,
तुम्हारे सामने आकर,
तो समझ लेना कि बर्दाश्त,
करने की हद खत्म हो गई है...!
🌸 शुक्रिया 🌸
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
● क्या आपको भी लगता है कि अक्सर सबसे ज्यादा मुस्कुराने वाला इंसान ही अंदर से सबसे ज्यादा टूटा होता है ?
● क्या कभी आपके जीवन में ऐसा मोड़ आया है जब आपकी "बर्दाश्त करने की हद" खत्म हो गई हो ?
● इस कविता की कौन सी पंक्ति आपके दिल को सबसे ज्यादा छू गई ?
● अपनों की खुशी के लिए खुद को भूल जाना—क्या यह त्याग सही है या गलत ?
● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।






4 Comments
बहुत सुंदर
ReplyDeleteNice one 👍
ReplyDeleteBeautiful poetry
ReplyDeleteKhud ko kisi ke liye nahi bhulna chahiye duniya selfish hai khud ki sochna chahiye.
ReplyDeleteशब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
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