★ मरहम - सिसकियों से सजदा तक ★
इबादत ( रूह का ठहराव )
वक़्त की लहरें भला अब क्या बिगाड़ेंगी,
ये दूरियां अब हमें कैसे पछाड़ेंगी,
हम वो किस्सा हैं जो खामोश रह कर भी,
आने वाले कल की दीवारों पर दहाड़ेंगी...!
न अब जिस्म की प्यास है, न शब्दों का मोह,
हम रूह बन गए हैं, जैसे सुबह की पहली लौ,
मिटा दी हैं हमने सारी हदें सरहदों की,
अब मैं "मैं" नहीं रही, और तुम "तुम" नहीं रहे वो...!
तुम मिले तो जैसे हर इबादत पूरी हुई,
पुरानी कोई अधूरी सी मन्नत पूरी हुई,
अब न जन्नत की आरज़ू है, न खुदा की तलाश,
तुम्हारी मौजूदगी में ही, मेरी हर जन्नत पूरी हुई...!
ये 'मरहम' से शुरू हुआ सफर, अब दुआ बन गया,
हर दर्द, हर आंसू, जीने की वजह बन गया,
अब खामोशी में भी हम एक-दूजे को पढ़ते हैं,
हमारा प्यार ही अब, हमारा खुदा बन गया...!
"सफर अब थम सा गया है, पर खत्म नहीं हुआ,
कि दर्द जो मरहम बना, वो अब खुदा हो गया...!"
अंतिम...!
🌸 शुक्रिया 🌸
अपनी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
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● क्या आप भी मानते हैं कि सच्चा प्रेम ही सबसे बड़ी इबादत (पूजा) है ?
● "अब मैं 'मैं' नहीं रही, और तुम 'तुम' नहीं रहे"—इस गहराई पर आपकी क्या राय है ?
● इस पूरी कविता के भाव को आप एक शब्द में क्या नाम देना चाहेंगे ?
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1 Comments
Wow beautiful ❤️
ReplyDeleteशब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
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