__________________________ मरहम - सिसकियों से सजदा तक (भाग - 5 )

मरहम - सिसकियों से सजदा तक (भाग - 5 )


★ मरहम - सिसकियों से सजदा तक ★

इबादत ( रूह का ठहराव )

दोस्तों, आज की यह कविता 'इबादत रूह का ठहराव' उस मुकाम को समर्पित है, जहाँ प्यार भौतिक सीमाओं से ऊपर उठकर रूहानी बन जाता है। अक्सर जीवन की जद्दोजहद में हम खुद को खो देते हैं, लेकिन जब कोई हमसफर हमारे दर्द का मरहम बनकर जीवन में आता है, तो सब कुछ बदलने लगता है। यह कविता उन जज्बातों का निचोड़ है, जहाँ अब न कोई जिस्म की प्यास है और न ही शब्दों का मोह—बस एक ऐसा ठहराव है जो सीधे रूह को छू जाता है। यह उस प्रेम की पराकाष्ठा है, जहाँ अपने प्रिय की मौजूदगी ही जन्नत और इबादत के बराबर महसूस होने लगती है। उम्मीद है, यह कविता उन गहरे अहसासों को बयां कर पाएगी, जो लफ्जों से ज्यादा खामोशी के संगीत में महसूस किए जाते हैं। इस कविता को जरूर पढ़ें...!

𝀈𝀈𝀈♥️𝀈𝀈𝀈

वक़्त की लहरें भला अब क्या बिगाड़ेंगी,

ये दूरियां अब हमें कैसे पछाड़ेंगी,

हम वो किस्सा हैं जो खामोश रह कर भी,

आने वाले कल की दीवारों पर दहाड़ेंगी...!

𝀈𝀈𝀈♥️𝀈𝀈𝀈

𝀈𝀈𝀈♥️𝀈𝀈𝀈

न अब जिस्म की प्यास है, न शब्दों का मोह,

हम रूह बन गए हैं, जैसे सुबह की पहली लौ,

मिटा दी हैं हमने सारी हदें सरहदों की,

अब मैं "मैं" नहीं रही, और तुम "तुम" नहीं रहे वो...!

𝀈𝀈𝀈♥️𝀈𝀈𝀈

𝀈𝀈𝀈♥️𝀈𝀈𝀈

तुम मिले तो जैसे हर इबादत पूरी हुई,

पुरानी कोई अधूरी सी मन्नत पूरी हुई,

अब न जन्नत की आरज़ू है, न खुदा की तलाश,

तुम्हारी मौजूदगी में ही, मेरी हर जन्नत पूरी हुई...!

𝀈𝀈𝀈♥️𝀈𝀈𝀈

𝀈𝀈𝀈♥️𝀈𝀈𝀈

ये 'मरहम' से शुरू हुआ सफर, अब दुआ बन गया,

हर दर्द, हर आंसू, जीने की वजह बन गया,

अब खामोशी में भी हम एक-दूजे को पढ़ते हैं,

हमारा प्यार ही अब, हमारा खुदा बन गया...!

𝀈𝀈𝀈♥️𝀈𝀈𝀈


"सफर अब थम सा गया है, पर खत्म नहीं हुआ,

कि दर्द जो मरहम बना, वो अब खुदा हो गया...!"

𝀈𝀈𝀈💞𝀈𝀈𝀈

अंतिम...!

👉 शुक्रिया 👈

अपनी अपनी 🌹

Ahasas Dayri 📕

मेरी बाकी कविताएँ पढ़ने के लिए [यहाँ क्लिक करें]

कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-

इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में पाठकों के लिए कुछ सवाल हैं:-

● "सिसकियों से सजदा तक" का यह बदलाव आपको कैसा लगा ?

● इस कविता की कौन सी लाइन आपके दिल के सबसे करीब रही ?

● क्या आप भी मानते हैं कि सच्चा प्रेम ही सबसे बड़ी इबादत (पूजा) है ?

● "अब मैं 'मैं' नहीं रही, और तुम 'तुम' नहीं रहे"—इस गहराई पर आपकी क्या राय है ?

● इस पूरी कविता के भाव को आप एक शब्द में क्या नाम देना चाहेंगे ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें। 

लेखिका की कलम से (निष्कर्ष):-

यह कविता एक लंबी और दर्दनाक यात्रा का वह सुखद अंत है, जहाँ सिसकियाँ धीरे-धीरे इबादत में बदल जाती हैं। जब प्यार 'मरहम' से शुरू होकर 'खुदा' का दर्जा पा ले, तो फिर न कोई डर बाकी रहता है और न ही कोई शिकायत। यह कविता हमें यह सिखाती है कि सच्चा प्यार वो है जो हमें खुद से मिला दे और हमारे वजूद को एक नया सुकून दे। अंत में, जब दो रूहें इस कदर एक हो जाती हैं कि 'मैं' और 'तुम' का भेद मिट जाए, तो वही जीवन का सबसे बड़ा सजदा और असली उपलब्धि है। उम्मीद है कि यह कविता आपके दिल को एक गहरे रूहानी सुकून से भर देगी।

अगर आप मेरी पुरानी कविता पढ़ना चाहते हैं, तो [यहाँ क्लिक करें]

Post a Comment

1 Comments

शब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
अपने विचार लिखिए 🤔
अपने अहसास शेयर कीजिए 🤝🤗
अपना आशीर्वाद दीजिए 🙌