★ मरहम - सिसकियों से सजदा तक ★
( मुकम्मल वादा - एक नई इबादत )
अब न कोई शर्त है, न ही कोई दस्तूर है,
तुम्हारा साथ होना ही, मेरा सबसे बड़ा नूर है,
जो कभी डर था कि खो न दूँ तुम्हें कहीं,
अब उस डर से मेरा दिल, कोसों दूर है...!
तुमने थामी जो उँगली, तो चलना सीख लिया,
गिरते हुए लम्हों को, संभलना सीख लिया,
तुम वो आग हो जिसने जलाया नहीं मुझे,
बल्कि अंधेरों में धूप बनके, ढलना सीख लिया...!
लिखेंगे अब मिलकर एक नई दास्तां अपनी,
जहाँ हर पन्ने पर होगी, सिर्फ़ मुस्कुराहट अपनी,
न होगा कोई दर्द जिसका मरहम ढूँढना पड़े,
अब तो खुदा भी देखेगा, ये इबादत अपनी...!
हाथों की लकीरों को अब पढ़ना छोड़ दिया मैंने,
किस्मत का सारा बोझ, तुम पर मोड़ दिया मैंने,
तुम ही दुआ हो मेरी, तुम ही मेरा खुदा,
इस टूटे हुए दिल को, अब तुमसे जोड़ दिया मैंने...!
To be continued...
🌸 शुक्रिया 🌸
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
● इस कविता में आपको सबसे अच्छी बात या शब्द कौन सा लगीं ?
● क्या आपने भी कभी किसी के साथ को अपना 'नूर' या 'सुकून' महसूस किया है ?
● "किस्मत का बोझ तुम पर मोड़ दिया"—क्या कभी आपने भी किसी पर इतना भरोसा किया है ?
● आपको कविता का शीर्षक 'मरहम' कैसा लगा? क्या यह भावनाओं के लिए सही नाम है ?
● "डर से दिल कोसों दूर है"—क्या आपने कभी किसी के आने से अपना डर खत्म होते देखा है ?
● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।






1 Comments
Lovely 😍
ReplyDeleteशब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
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