__________________________ मरहम - सिसकियों से सजदा तक ( भाग - 2)

मरहम - सिसकियों से सजदा तक ( भाग - 2)

    

★ मरहम - सिसकियों से सजदा तक ★

( हक और हमसफर )

इजाज़त की क्या बात, ये हक ही तुम्हारा हैं,

अँधेरे रास्तों में, तुम ही तो सितारा हो,

बुझे दीयों को फिर से रोशन कर लो तुम,

किस्मत का पन्ना, चाहों तो फिर भर लो तुम...!

गर सांसों में घुटन हैं, तो हवा बन जाऊं मैं,

तुम्हारें हर मर्ज की, दवा बन जाऊं मैं,

खिड़की क्या, पूरा दिल ही तुम्हारा हैं,

इस उलझे हुए जीवन का, तू ही किनारा हैं...!

थकी आँखों को अब हकीकत का दीदार मिले,

पुरानी किताबों को, नया सा किरदार मिले,

तुम मरहम बनो, या खुद को सुलझा लो,

बस एक बार मुस्कुरा कर, खुद को सजा लो...!



To be continued....


🌸 शुक्रिया 🌸


आपकी अपनी 🌹

Ahasas Dayri 📕


● इस कविता में आपको कौन सा शब्द सबसे ज़्यादा "सुकून" देने वाला लगा ? (जैसे: हक, सितारा, मरहम या किनारा)


● क्या आपके पास भी कोई ऐसा 'हमसफर' है जो आपके अंधेरे रास्तों में 'सितारे' जैसा साथ देता है ?


● क्या आपको भी लगता है कि अपनों की एक मुस्कुराहट हमारे हर मर्ज की दवा बन सकती है ?


● "किस्मत का पन्ना फिर से भरना"—इस बात से आप कितना सहमत हैं ? क्या हमें हर दिन को नई शुरुआत मानना चाहिए ?


● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें। 







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