(भाग 1: पुकार)
दोस्तों, आज की मेरी यह कविता 'मरहम - सिसकियों से सजदा तक' उस गहरे जज्बात को समर्पित है, जो किसी के खो जाने के बाद हमारे दिल में एक खालीपन छोड़ जाता है। अक्सर जीवन के सफर में हम ऐसी जगह पहुँच जाते हैं, जहाँ दर्द और तन्हाई ही हमारे सबसे बड़े साथी बन जाते हैं, और हर तरफ अंधेरा सा महसूस होता है। यह कविता उन जज्बातों का निचोड़ है, जहाँ हम खुद से और अपने खुदा से फिर से जुड़ने की कोशिश करते हैं। यह सिसकियों से निकलकर सुकून और एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने की एक छोटी सी कोशिश है, जहाँ हम अपने जख्मों को भरने के लिए किसी सहारे की उम्मीद करते हैं। उम्मीद है, यह कविता उन लम्हों को बयां कर पाएगी जो शब्दों से ज्यादा हमारी खामोश पुकार में महसूस किए जाते हैं। इस कविता को जरूर पढ़ें...!
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इस दर्द के लिए तुमको मरहम बना लूं क्या,
तुम कहो तो थोड़ी सी मुस्कुरा लूं क्या,
मुझें फिर से क़िस्मत आज़मानी है अपनी,
फिर से एक बार तुमसे दिल लगा लूं क्या,
साँस लेती हूं तो दम सा घुटता है,
तुम्हारे दिल में एक खिड़की बना लूं क्या...!
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काटती है हर रात मुझे अंधेरों में,
बुझे दिये को फिर से जला लूं क्या,
सूरज की किरणें मेरे चेहरे को छू रही,
किरणों से खुद को चमका लूं क्या,
उलझी हूं खुद में, तुम कहो तो खुद को सुलझा लूं क्या...!
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आँखें भी थक गई हैं अब सपनो से,
तुम कहो तो हकीकत बना लूं क्या।
पुरानी किताबों के कुछ पन्ने जैसा,
कहो तो फिर से एक बार जीवन बना लूं क्या।
दर्द है तुमसे दूरी और तन्हाई का,
इस दर्द के लिए तुमको मरहम बना लूं क्या...!
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To be continued....
👉 शुक्रिया 👈
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
अगर आप मेरी पुरानी कविता पढ़ना चाहते हैं, तो [यहाँ क्लिक करें]।
कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-
इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में पाठकों के लिए कुछ सवाल हैं:-
● कविता की कौन सी पंक्ति आपके दिल के सबसे करीब रही ? (जैसे: 'तुम्हारे दिल में एक खिड़की बना लूं क्या')
● क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा व्यक्ति या याद है, जो आपके लिए 'मरहम' का काम करती है ?
● कविता में अंधेरे से निकलकर 'सूरज की किरणों' की ओर बढ़ने की बात कही गई है। क्या आप भी मानते हैं कि दर्द के बाद मुस्कुराहट ज़रूरी है ?
● "फिर से एक बार तुमसे दिल लगा लूं क्या"—क्या टूटने के बाद फिर से किसी पर भरोसा करना आसान होता है ? अपनी राय दें।
●"आँखें भी थक गई हैं अब सपनो से..."—क्या आप भी कभी ऐसी स्थिति से गुजरे हैं जहाँ आप सपनों को हकीकत में बदलते देखना चाहते थे ?
● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।
लेखिका की कलम से(निष्कर्ष):-
'मरहम - सिसकियों से सजदा तक' महज एक कविता नहीं, बल्कि खुद को फिर से तलाशने की एक यात्रा है। जब हम अपने अतीत के दर्द और पुरानी यादों के बोझ को कम कर, आशा की किरण की ओर देखना शुरू करते हैं, तभी जीवन में असल बदलाव आता है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि भले ही हम अंदर से कितने भी उलझे हुए या उदास क्यों न हों, लेकिन हमेशा एक नया जीवन और खुद को फिर से संवारने की गुंजाइश बाकी रहती है। अंत में, दर्द का मरहम किसी और के हाथ में नहीं, बल्कि हमारे अपने सब्र और खुद पर यकीन में छिपा होता है। उम्मीद है, यह कविता आपके दिल के किसी कोने को छू पाएगी और आपको जीवन के प्रति एक नई सकारात्मक सोच देगी।
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1 Comments
Best poem
ReplyDeleteशब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
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अपना आशीर्वाद दीजिए 🙌