__________________________ मैं खुद की प्रेमिका होती

मैं खुद की प्रेमिका होती

★ मैं खुद की प्रेमिका होती ★

दोस्तों, आज की यह कविता 'मैं खुद की प्रेमिका होती' जिंदगी के उस खूबसूरत और सुकून भरे मोड़ की दास्तान है जब इंसान दूसरों से उम्मीदें लगाना छोड़कर खुद से मोहब्बत करना सीख जाता है। जब दुनिया के दिए जख्म, अकेलेपन का डर और दूसरों से वफ़ा की चाह दिल को थकाने लगती है, तब खुद का हाथ थामना ही सबसे बड़ा सहारा बनता है। इस कविता के माध्यम से मैंने उसी आत्म-सम्मान, खुद को गले लगाने की तड़प और अपनी ही बिखरी दुनिया को बिना किसी सहारे के समेटने के जज्बातों को शब्दों का रूप देने की कोशिश की है। उम्मीद है कि खुद से प्यार और हिम्मत के इस अनोखे अहसास को समेटती यह कविता आपके दिल को ज़रूर छुएगी...!

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अगर मैं खुद की प्रेमिका होती,

तो न कभी अकेले में रोती,

दुनिया भले ही लाख सताए,

मैं खुद का ही हाथ थामती,

दूसरों से वफ़ा मांगने के बजाय,

मैं खुद को ही अपना मानती...!

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मेरे दिल में जो तूफ़ान छुपा है,

उसे अपनी मुस्कान से सजाती,

कोई समझे या ना समझे मुझे,

मैं खुद को गले से लगाती...!

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बचपन की बातें, बचपन की यादें,

अब दिल को मेरे ना दुखातीं,

मैं खुद से ही करती मोहब्बत,

और खुद की ही पलकें बिछाती...!

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जब टूटकर बिखरती मैं कहीं,

तो खुद ही खुद को समेटती,

किसी और के सहारे के बिना,

मैं अपनी ही दुनिया समेटती...!

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हाँ आम लड़की नहीं हूँ मैं,

मैं तो बहती हुई एक हवा हूँ,

अगर ज़ख्म मिला है मुझे इस जहाँ से,

तो मैं खुद के लिए ही दवा बनती...!

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👉 शुक्रिया 👈

आपकी अपनी 🌹 

Ahasas Dayri 📕

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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-

इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में कुछ सवाल हैं:-

● इस कविता की कौन सी लाइन आपको सबसे अच्छी लगी ?

● क्या आप भी मानते हैं कि खुद से प्यार करना दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास है ?

● "मैं खुद के लिए ही दवा होती" इस बात से आप कितने सहमत हैं ? 

● जब आप कभी उदास होते हैं, तो खुद को संभालने के लिए क्या करते हैं ?

● क्या आपने कभी खुद को गले लगाकर कहा है कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ" ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।

निष्कर्ष (Conclusion):-

अंत में, यह कविता हमें यह अहसास दिलाती है, कि खुद से प्रेम करना ही जीवन की असली सच्चाई है।दूसरों से प्यार की उम्मीद में हम खुद को खो देते हैं, अक्सर दूसरों की खुशी के चक्कर में हम खुद रो देते हैं। पर जब हम खुद को अपना साथी बना लेते हैं, तब हम हर उलझन से खुद को बाहर निकाल लेते हैं। यह 'आत्म-प्रेम' स्वार्थ नहीं, बल्कि एक सम्मान है,खुद को टूटने से बचाना ही सबसे बड़ी पहचान है। हम अपनी मुस्कान के लिए किसी और पर निर्भर क्यों रहें? जब हम खुद अपनी खुशियों का आधार बन सकें। ज़िंदगी के हर जख्म के लिए खुद ही मरहम बन जाइए,खुद को गले लगाकर, हर गम से ऊपर उठ जाइए। कोई आपको समझे या न समझे, इसकी परवाह छोड़ दें,अपनी खुशियों के लिए खुद ही सारे नाते जोड़ लें। आप हवा की तरह आज़ाद हैं, किसी के मोहताज नहीं,खुद से बड़ा इस दुनिया में कोई और आपका राज़ नहीं। स्वयं का सहारा बनकर, अपनी मंज़िल को खुद संवारें,क्योंकि आप ही अपनी ज़िंदगी के सबसे सच्चे सितारे हैं।

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1 Comments

  1. Sarsavti tomar4 June 2026 at 08:29

    Khud se pyar karna bahut jaruri hai. Bahut sundar kavita hai.

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