★ खुद से मुलाकात ★
अपनी ही तलाश में,
मैं दर-बदर भटक रही,
खुद में ही बिखर कर आज,
खुद को ही परख रही,
बरसों बाद जो देखा खुद को,
आज गौर से आईने में,
एक अजनबी सी रूह दिखी,
उस काँच के सीने में...!
आईना भी बोल पड़ा,
ये क्या तलाश करती है,
तू तो कब की खो चुकी,
अब क्यों आहें भरती है,
जिसे तू देख रही है सामने,
वो तो बस इक साया है,
दर्द को ओढ़ कर तूने,
अपना वजूद गँवाया है...!
बाहर आ इस ज़ख्म से,
तू क्यों थमी खड़ी है,
तेरे इंतज़ार में देख,
नीली गगन पड़ी है,
वो पुकारता है तुझे,
तू भी उसे आवाज़ दे,
अपने दबे हुए अरमानों को,
एक नया आगाज़ दे...!
पत्थर सा जो मन था मेरा,
पिघल कर बह गया,
आँखों की नमी में आज,
सारा ग़म रह गया,
पर इन भीगी पलकों में ही,
छिपी एक मुस्कान है,
दुखों को राख कर दे,
यही तो तेरी शान है...!
उठ और मुट्ठी में कर ले,
इस पूरे जहान को,
अपनी ताकत से लिख दे,
एक नई दास्तान को,
ठोकरें तो बस बहाना थीं,
तुझे रास्ता दिखाने का,
तेरी असल पहचान है,
सिर्फ जीत कर दिखाने का...!
🌸 शुक्रिया 🌸
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
● क्या आपने कभी आईने में खुद को एक 'अजनबी' की तरह महसूस किया है ?
● इस कविता की कौन सी लाइन आपके दिल के सबसे करीब रही ?
● पत्थर से मन को पिघलाने के लिए आपकी ज़िंदगी में वो 'नमी' क्या थी ?
● क्या आप भी अपने दबे हुए अरमानों को एक नई उड़ान देने के लिए तैयार हैं ?
● आपके हिसाब से "हार" जीवन का अंत है या सिर्फ एक नया रास्ता दिखाने का बहाना ?
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1 Comments
खुद से मुलाकात करना भी जरूरी है बहुत सुन्दर कविता
ReplyDeleteशब्दों में ढालिए अपने खयालात,
हम सुनने को बेताब हैं। ✍️📖
दिल से दिल तक पहुँचे जो अहसास,
वही तो सबसे खास हैं। 🤗💖
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