__________________________ लिखा है क्या लकीरों में

लिखा है क्या लकीरों में

 ★लिखा है क्या लकीरों में★

दोस्तों, आज की यह कविता 'लिखा है क्या लकीरों में' जिंदगी के उस कठिन दौर की दास्तान है जब इंसान खुद को पूरी तरह टूटा हुआ और बेबस महसूस करता है। जब लाख कोशिशों के बाद भी खुशियाँ नसीब नहीं होतीं, तब दिल में तकदीर की लकीरों को लेकर कई सवाल उठते हैं। इस कविता के माध्यम से मैंने ईश्वर से की गई उसी मासूम शिकायत, मन की उदासी और बिखरते जज्बातों को शब्दों का रूप देने की कोशिश की है। उम्मीद है कि दुःख और संघर्ष के इन अहसासों को समेटती यह कविता आपके दिल को ज़रूर छुएगी...!

लिखा है क्या लकीरों में,

मुझे पढ़ना नहीं आता...!

तू ही बता दे क्या है लिखा,

ओ खुदा मेरे...!

बस इतना बता दे मुझे....✍️!

𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐

जिंदगी ये मेरी है बस इतनी सी,

ना जाने क्यों है ये मुझसे ख़फ़ा सी..!

कह दे क्यों है ख़फ़ा तू मुझसे,

ऐ जिंदगी...!

ना जाने क्यों है इतनी उदासी,

जिंदगी से मेरी...✍️!

𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐

पूछती हूँ खुद से,

क्या कमी रह गई है...!

मेरी इन आँखों में,

क्यों नमी रह गई है...!

सब कुछ तो किया मैंने,

जो तूने कहा था...!

फिर क्यों मेरी खुशियाँ,

कही थमी रह गई हैं...!

ओ खुदा मेरे...!

बस इतना बता दे मुझे....✍️!

𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐

पत्थर की बन गई हूँ,

अब रोया नहीं जाता...!

ये दुखों का जो समंदर है,

अब सोया नहीं जाता...!

तू तो सबका खुदा है,

फिर मेरा क्यों नहीं होता...!

मेरी तन्हाई देख कर,

तेरा दिल क्यों नहीं रोता...!

ओ खुदा मेरे...!

बस इतना बता दे मुझे....✍️!

𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐

अब और नहीं सह सकती,

ये खामोश सितम...!

तोड़ दे ये साँसें,

या मिटा दे ये गम...!

बिखर चुकी हूँ मैं,

जैसे कांच का टुकड़ा हो...!

अब तू ही बता,

कैसे जोड़ूँ ये मुखड़ा...!

ओ खुदा मेरे...!

बस इतना बता दे मुझे....✍️!

𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐

चाहती हूँ,

कि तू भी मेरा हाल देख ले...!

मेरे इन बेज़ुबान सवालों का,

कोई तो जवाब भेज दे...!

बहुत भारी है ये उदासी,

अब उठाई नहीं जाती...!

मेरे बिखरे हुए इन टुकड़ों को,

तू ही समेट दे...!

ओ खुदा मेरे...!

बस इतना बता दे मुझे....✍️!

𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐

हार चुकी हूँ अब मैं,

इस बोझ को उठाते उठाते...!

अकेले में खुद को,

यूँ ही समझाते-समझाते...!

अगर मेरा नसीब,

तेरे ही हाथों में है खुदा...!

तो क्यों रखा है मुझे,

तूने खुशियों से जुदा...!

ओ खुदा मेरे...!

बस इतना बता दे मुझे....✍️!

𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐𝄐

लिखा है क्या लकीरों में,

मुझे पढ़ना नहीं आता...!

तू ही बता दे क्या है लिखा,

ओ खुदा मेरे...!

बस इतना बता दे मुझे....✍️!

𝀈𝀈𝀈𝀒𝀈𝀈𝀈

👉 शुक्रिया 👈

आपकी अपनी 🌹

Ahasas Dayri 📕

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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-

इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में कुछ सवाल हैं:-

● क्या आप अपनी किस्मत की लकीरों पर यकीन करते हैं या अपनी मेहनत पर ?

● क्या आपको कभी लगा है कि आपकी ज़िंदगी आपसे बिना बात के नाराज़ है ?

● जब मन भारी हो और वजह समझ न आए तब आप क्या करते हैं ?

● सब कुछ सही करने के बाद भी खुशी न मिले तो दिल में क्या ख्याल आता है ?

● क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि आँखों में आँसू तो हों पर रोया न जाए ?

● क्या आपने कभी भगवान से पूछा है कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों ?

● जब इंसान अंदर से पूरी तरह टूट जाए तो उसे वापस कैसे जोड़ा जाए ?

● आपके मन का वो कौन सा सवाल है जिसका जवाब आज तक नहीं मिला ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें। 

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लेखिका की कलम से (निष्कर्ष):-

'लिखा है क्या लकीरों में' कविता उस कठिन दौर का एक प्रतिबिंब है, जब इंसान अपने ही हालातों के आगे खुद को बेबस और हारा हुआ महसूस करता है। यह कविता केवल ईश्वर से किया गया एक सवाल नहीं, बल्कि उस अंतर्मन की सिसक है, जो अनगिनत संघर्षों के बाद भी सुकून की एक किरण ढूँढने की कोशिश कर रही है। जब हम अपनी पूरी मेहनत और ईमानदारी के बावजूद उम्मीदों के टूटने का दंश झेलते हैं, तो मन में उठने वाले ये सवाल स्वाभाविक हैं। लेकिन याद रखिए, लकीरों से कहीं अधिक हमारी मेहनत और हमारा धैर्य हमारे भविष्य को परिभाषित करता है। यह कविता हमें इस कठिन सत्य को स्वीकार करने की शक्ति देती है कि हर दर्द का अंत होता है और बिखरने के बाद ही संभलने का असली साहस पैदा होता है। अपनी इन सिसकियों को खुद तक सीमित न रखें, क्योंकि कभी-कभी उन्हें साझा करना ही टूटे हुए कांच को जोड़ने की पहली कड़ी साबित होता है।


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