__________________________ हमसफर के नाम

हमसफर के नाम

 
 
★ हमसफर के नाम ★

दोस्तों, आज की मेरी यह कविता 'हमसफ़र के नाम' ज़िंदगी की एक बहुत बड़ी सच्चाई को सामने लाती है। आज के समय में हम सब पैसे कमाने और एक आलीशान ज़िंदगी जीने के पीछे इस कदर भाग रहे हैं कि हमारे पास अपनों के लिए ही वक़्त नहीं बचता।

इस कविता में मैंने बहुत आसान शब्दों में उसी अकेलेपन और पछतावे को लिखा है, जहाँ हमारे पास बड़ी-बड़ी गाड़ियां और महलों जैसे घर तो होते हैं, लेकिन सुकून की वो चाय और हमसफ़र का वो साथ कहीं खो जाता है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि दुनिया की हर दौलत मिलकर भी अपनों से मिलने वाले सच्चे सुख की बराबरी नहीं कर सकती।

अगर आप भी अपनी व्यस्त ज़िंदगी के बीच कभी उन पुरानी खूबसूरत यादों को मिस करते हैं, तो यह कविता आपको बेहद पसंद आएगी। इसे पूरा ज़रूर पढ़ें...!

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गैलरी में ढेरों तस्वीरें सहेज रखी हैं मैंने,

पर उन चेहरों को गौर से देखने की फुर्सत नहीं,

जिनकी मुस्कान के लिए दिन-रात जलाए हैं चिराग,

आज उन आँखों में झाँकने की भी हिम्मत नहीं...!

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दौड़ता हूँ घर की छतें ऊँची करने की खातिर,

पर घर के अंदर के सूनेपन का हिसाब भूल गया,

जो साथ चल रही थी अब तक, मेरी हर मुश्किल में,

मैं उसी का हाथ थामना, इस भागदौड़ में भूल गया...!

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वो शामें अब कहाँ हैं, जो साथ चाय पीते बीतती थीं,

अब तो बस फाइलों में,

और घड़ी की सुइयों में उलझता हूँ,

रोटी तो कमा ली बहुत,पर सुकून की रोटी हार आया,

मैं रिश्तों के इस बाज़ार में,

खुद को ही निलाम कर आया...!

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ईंटों की दीवारें तो खड़ी कर ली हैं आलीशान,

पर इन कमरों में गूँजती खामोशी दिल को चुभती है,

काश मैं लौट पाता उन दिनों में, जहाँ वक़्त मेरा था,

अब तो दौलत के ढेर पर बैठकर,

बस उम्र कम होती दिखती है...!

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वो जो अब भी इंतज़ार में, दरवाजे तक आती है,

उसे एक मुस्कान देने को भी मैं मोहताज हो गया,

ज़िंदगी की इस दौड़ में, जीत तो गया मैं शायद,

पर जिसे जीतना था, उसी से मैं हार गया...!

𝀈𝀈𝀈💔𝀈𝀈𝀈

👉 शुक्रिया 👈

सपनों के महल बनाने की होड़ में, कहीं अपनों की मुस्कान तो नहीं खो दी हमने ? आज की यह पंक्तियाँ उन सभी के नाम, जो दौड़ तो रहे हैं, पर मंजिल के पास आकर खुद को अकेला पाते हैं। 🏠🥀

आपकी अपनी 🌹 

Ahasas Dayri 📕

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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-

इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में कुछ सवाल हैं:-

● क्या आप भी अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अपनों के लिए समय निकालना भूल गए हैं ?

● आपके लिए जीवन में क्या ज्यादा ज़रूरी है—करियर की सफलता या परिवार का साथ ?

● वह कौन सी एक चीज़ है जिसे आप पाने की कोशिश में अपनी खुशी या सुकून खो बैठे हैं ?

● क्या आपको भी कभी-कभी लगता है कि हमने घर तो बना लिया, पर उसमें 'अपनापन' कम हो गया है ?

● अगर आपको पुरानी यादों में लौटने का मौका मिले, तो आप उस बीते हुए वक्त का क्या करेंगे ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।

अगर आप मेरी पुरानी कविता पढ़ना चाहते हैं, तो [यहाँ क्लिक करें]

 लेखिका की कलम से(निष्कर्ष):-

हमसफ़र के नाम' हमें जीवन की एक कड़वी सच्चाई का आईना दिखाती है। हम भौतिक सुखों और करियर की दौड़ में इतना आगे निकल जाते हैं कि हम उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं, जिनके लिए हमने यह सब कमाया था। यह कविता हमें याद दिलाती है कि आलीशान घरों की दीवारों के पीछे का सूनापन, अपनों के साथ बिताए गए उन छोटे-छोटे पलों की कमी को पूरा नहीं कर सकता।

सच्ची सफलता केवल धन या महलों में नहीं, बल्कि अपने हमसफ़र और अपनों के साथ बिताए गए सुकून भरे समय में है। यह कविता एक चेतावनी और एक सीख दोनों है—दौड़ में शामिल रहें, लेकिन अपनों का हाथ न छोड़ें, क्योंकि मंजिल पर पहुँचकर अगर साथ में अपने न हों, तो वह जीत वास्तव में एक हार के समान है।

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