तारबाहर की वह खौफनाक शाम:- जब पटरियों पर थम गई सासें
यह कहानी छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर के तारबाहर इलाके का है। तारीख 22 अक्टूबर 2011, दिन शनिवार था। शाम के ठीक सात बज रहे थे। बाजार में चहल-पहल थी, दफ्तर से थके-हारे लोग अपने घरों की तरफ लौट रहे थे, और सड़कों पर आम दिनों की तरह गाड़ियों का शोर था।
मुख्य रेल मार्ग पर स्थित तारबाहर का रेलवे फाटक उस वक्त बंद था। दोनों तरफ गाड़ियों और पैदल चलने वाले मुसाफिरों की लंबी कतार लग चुकी थी। हवा में हल्की सी ठंडक घुलने लगी थी और लोग फाटक खुलने का इंतजार कर रहे थे। लेकिन भीड़ में कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्हें घर पहुँचने की अजीब सी बेचैनी और जल्दी थी। उन्होंने सब्र करने के बजाय वह खतरनाक कदम उठाया जो उनकी जिंदगी का आखिरी कदम बनने वाला था। वे बंद फाटक के नीचे झुककर पटरियों को पार करने लगे।
जब एक सेकंड में बिखर गई कई जिदगियां
उस वक्त पटरियों पर ट्रेनों की आवाजाही लगातार बनी हुई थी। एक मालगाड़ी अभी-अभी गुजरी ही थी कि लोगों ने बिना दाएँ-बाएँ देखे एक के बाद एक ट्रैक पार करना शुरू कर दिया। उन्हें ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि बगल वाली पटरी पर एक तेज रफ्तार ट्रेन काल बनकर उनकी तरफ दौड़ी चली आ रही है।
जब तक कोई कुछ समझ पाता या चेतावनी की सीटी पर ध्यान देता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। किसी को क्या पता था कि कुछ ही पलो में वह पटरी इंसानी खून से लाल होने वाली है। और ट्रेन ने पटरियों पर मौजूद लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। एक ही सेकंड में वहाँ चीख-पुकार मच गई। और रोने की ऐसी डरावनी आवाज़ें गूंजी, जिन्हें सुनकर कलेजा कांप जाए। उस खौफनाक हादसे में लगभग 12 से अधिक लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई थी, और पटरी पर चारों तरफ इंसानी जिस्म के टुकड़े और खून बिखर गया था। उस शाम बिलासपुर का आसमान भी इस दर्दनाक मंजर को देखकर रो पड़ा था।
रात के सन्नाटे में गूँजती सिसकियां और साये
साल बीतते गए, सरकार ने उस खतरनाक क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों को हमेशा के लिए रोकने के लिए वहाँ एक पक्का अंडरब्रिज बना दिया। आज गाड़ियाँ और लोग उसी अंडरब्रिज से सुरक्षित निकल जाते हैं। पटरियों पर अब वैसी आवाजाही नहीं होती, लेकिन तारबाहर के पुराने हादसे आज भी उस रात को भूला नहीं पाए हैं।
जिन लोगों के मकान उस ट्रैक के करीब हैं, उनका कहना है कि आज भी जब रात के ठीक बारह बजते हैं और चारों तरफ सन्नाटा पसर जाता है, तो उस जगह का माहौल पूरी तरह बदल जाता है। रात के सन्नाटे में पटरियों के पुराने हिस्से से बेहद धीमी, दबी हुई सिसकियाँ और किसी के रोने की आवाजें सुनाई देती हैं।
मोहल्ले के कई नौजवानों और राहगीरों ने यह दावा किया है कि उन्होंने रात के वक्त उस अंडरब्रिज के पास धुंधले से इंसानी साये देखे हैं—बिल्कुल वैसे ही साये, जो पटरियों के किनारे चलते हैं और अचानक हवा में गायब हो जाते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि जिन बदकिस्मत लोगों की जान उस शाम अचानक और इस तरह बेरहमी से गई थी, शायद उनकी भटकी हुई रूहें आज भी अपनी उस अधूरी और डरावनी शाम से बाहर नहीं निकल पाई हैं।
निष्कर्ष:- एक अनसुलझा सच
22 अक्टूबर 2011 की वह शाम बिलासपुर के इतिहास में एक ऐसा काला सच बन गई है, जिसके निशान भले ही वक्त के साथ मिट्टी के नीचे या अंडरब्रिज की कंक्रीट में छिप गए हों, लेकिन उसकी दहशत आज भी तारबाहर की हवाओं में ज़िंदा है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जरा सी जल्दबाजी या एक पल की लापरवाही इंसान को मौत के मुँह में कैसे धकेल सकती है, और कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो कभी इतिहास नहीं बनते, बल्कि हमेशा के लिए डर बनकर जिंदा रह जाते हैं।
कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-
● क्या जल्दबाजी में उठाया गया एक छोटा सा कदम जिंदगी भर का पछतावा और कभी न भरने वाला जख्म बन सकता है ?
● क्या अचानक और दर्दनाक मौतें इंसान की आत्मा को उस स्थान से बांध देती हैं, जहाँ उसने अपनी आखिरी साँस ली थी ?
● आधुनिकता और अंडरब्रिज के बन जाने से क्या वाकई उस जगह का पुराना खौफ और वहाँ के लोगों का डर कभी पूरी तरह मिट सकता है ?
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