★ मैं फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ ★
यह कविता उन सभी महिलाओं या व्यक्तियों के दिल की आवाज़ है जो अक्सर दूसरों की खुशियों और जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते कहीं न कहीं अपनी खुद की पहचान को पीछे छोड़ देते हैं। इस कविता के माध्यम से मैंने उसी अहसास और खुद से दोबारा मिलने की तड़प को शब्दों में पिरोने की कोशिश की है...!
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मैं फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ
इन रिश्तों की बंदिशों से परे,
एक छोटा सा आसमाँ चाहती हूँ,
जहाँ मैं किसी की ज़रूरत न बनूँ,
बस अपना ही एक ठिकाना चाहती हूँ...!
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सुबह की धूप खिड़की पर आए,
पर कोई मुझे उठाने वाला न हो,
रात की चांदनी में देर से लौटूं,
पर कोई सवाल उठाने वाला न हो...!
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माँ, बेटी, पत्नी, बहन,
इन नामों के पीछे कहीं खो गई हूँ मैं,
जिम्मेदारियों की चादर ओढ़कर,
वक्त से पहले ही सो गई हूँ मैं...!
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मैं कहना चाहती हूँ वो अनगिनत बातें,
जो रातों की तन्हाई में सिसकती हैं,
साझा करना चाहती हूँ वो तकलीफें,
जो सीने में आग बन धधकती हैं,
होकर अनजान दुनिया की नज़रों से,
खुद की पहचान फिर से पाना चाहती हूँ,
भूलकर सारे सलीके और कायदे,
मैं अपना वो बचपना आजमाना चाहती हूँ...!
★★🕊★★
न काम का बोझ हो, न घर की फिक्र,
न किसी और की खुशियों का ख्याल,
शोर थमे सब रिश्तों का, बस दिल की एक सदा रहे,
न मैं किसी की आस बनूँ, न मुझमें कोई बसा रहे,
धड़कन अपनी सुन सकूँ, इतना सन्नाटा चाहती हूँ,
मैं खुद को खुद से मिला सकूँ, वो एक लम्हा चाहती हूँ...!
★★🕊★★
न कोई जवाब हो, न कोई मलाल,
हाँ, मैं भी थोड़ा जीना चाहती हूँ,
एक लड़की बनकर, बस अपने लिए,
खुद को समेटकर इस भीड़ से,
एक मुकम्मल लम्हा जीना चाहती हूँ...!
★★🕊★★
"अनगिनत बातें, अधूरी ख्वाहिशें और खुद से मिलने की एक छोटी सी कोशिश,
हर रिश्ते से परे, आज मैं सिर्फ अपनी होना चाहती हूँ...!" 🌿
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👉 शुक्रिया 👈
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-
इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में कुछ सवाल हैं जो अक्सर मुझे सोचने पर मजबूर करते हैं:-
● इस कविता की कौन सी लाइन आपके दिल के सबसे करीब लगी ?
● क्या आपने भी कभी अपनी ज़िम्मेदारियों के बीच खुद को 'खोया' हुआ महसूस किया है ?
● अगर आपको अपना बचपना आजमाने का एक मौका मिले, तो आप सबसे पहले क्या करना चाहेंगी ?
● इस कविता को पढ़कर आपके दिल में सबसे पहला ख्याल क्या आया ?
● क्या आपको भी लगता है कि हर रिश्ते से परे, कभी-कभी खुद से मिलना और खुद को समय देना कितना ज़रूरी है ?
● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।
निष्कर्ष:- (Conclusion)
'मैं फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ' कविता उन सभी महिलाओं और व्यक्तियों की दबी हुई भावनाओं को आवाज देती है, जो दूसरों की खुशियों और जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते कहीं न कहीं स्वयं को खो देते हैं। यह कविता केवल एक कविता नहीं, बल्कि खुद को फिर से तलाशने और अपनी खोई हुई पहचान को पाने का एक साहसिक प्रयास है। अंततः, यह हमें यह संदेश देती है कि रिश्तों और जिम्मेदारियों के संसार में रहते हुए भी, अपने अस्तित्व को बचाए रखना और खुद को समय देना अत्यंत आवश्यक है, ताकि हम अपनी अधूरी इच्छाओं और सुकून के उन लम्हों को जी सकें, जहाँ हम केवल 'हम' नहीं, बल्कि 'स्वयं' होते हैं।
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