★ वो बारिश वो ज़िद और मैं ★
दोस्तों, आज की मेरी यह कविता 'वो बारिश वो ज़िद और मैं' उन अनकहे दर्द और उस पल के बारे में है, जब सब कुछ अचानक बिखर सा जाता है। बारिश अक्सर पुरानी यादों को ताज़ा कर देती है, और इस कविता में बारिश का वही रूप दिखाया गया है जो खुशियों के बजाय किसी के चले जाने का गवाह बनता है।
इस कविता में मैंने उस जज़्बाती सफ़र को शब्दों में पिरोने की कोशिश की है, जहाँ एक तरफ प्यार का भरोसा टूटने का दर्द है, तो दूसरी तरफ खुद को फिर से संभालने की ताकत भी है। यह कविता हमें सिखाती है कि कैसे मुश्किल समय में भी हम अपनी हिम्मत को पहचान सकते हैं।
अगर आपने भी कभी किसी के चले जाने के बाद खुद को अकेले पाया है और फिर एक नई शुरुआत की है, तो यह कविता आपको बहुत गहराई से महसूस होगी। इसे पूरा ज़रूर पढ़ें...!
一ー一🤝ー一ー
हाथों में हाथ होने से,
कोई साथ नहीं होता,
जो रूह न समझे,
वो हमराह नहीं होता...!
छोड़ा जो उसने हाथ,
तो बस भरोसा टूटा था,
वो शख्स तो कब का,
मेरे अंदर से छूटा था...!
उस रात घटाएँ नहीं,
मेरी यादें बरस रही थीं,
मैं ज़मीं पर बिखरी थी,
और उसकी ज़िदें अकड़ रही थीं...!
एक बार मुड़कर देखता,
तो शायद मंज़र बदल जाता,
मेरे बिखरते वजूद को,
उसका एक लम्हा सँभाल जाता...!
𝀈𝀈𝀈💫𝀈𝀈𝀈पर वो चला गया चुपचाप,
जैसे कोई गुनाह न हो,
ऐसे मुड़ा कि जैसे पीछे,
कोई तबाह न हो...!
सवालों के भँवर में मुझे,
तन्हा छोड़ गया वो,
ज़िंदा तो थी मैं,
पर जीने की तमन्ना तोड़ गया वो...!
सर्दी से बदन काँपा,
पर रूह सुलगती रही,
हैरानी थी कि मौत के साये में,
ज़िंदगी मचलती रही...!
जिसे उम्र भर का घाव समझा,
वो तो मरहम की परछाईं थी,
उस काली भीगी रात में,
मुझे अपनी असलियत दिखाई दी...!
अब जाना कि कुछ लोग,
मंज़िल तक साथ नहीं देते,
वो सिर्फ तजुर्बा देते हैं,
कभी हाथ नहीं देते...!
उसने दामन क्या छोड़ा,
मैंने खुद को थाम लिया,
उसकी बेवफाई को मैंने,
अपनी आज़ादी का नाम दिया...!
खोया नहीं उसे मैंने,
बस एक वहम मिटाया है,
उस रात मरकर मैंने,
खुद को ज़िंदा पाया है...!
👉 शुक्रिया 👈
आपकी अपनी 🌹
अहसास डायरी 📕
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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-
इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में कुछ सवाल हैं:-
● इस कविता में आपको सबसे ज्यादा कौन सी लाइन अच्छी लगी ?
● क्या आपको लगता है कि कुछ लोग हमें मंज़िल तक नहीं बल्कि सिर्फ तजुर्बा देने आते हैं ?
● क्या कभी किसी के जाने के बाद आपने खुद को और भी ज्यादा मजबूत महसूस किया है ?
● बेवफाई को आज़ादी का नाम देना— इस सोच के बारे में आपकी क्या राय है ?
● इस कविता के दर्द और हौसले को आप एक शब्द में क्या कहेंगे ?
● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।
लेखिका की कलम से(निष्कर्ष):-
इस कविता का अंत हमें यह अहसास दिलाता है कि जीवन में किसी का चले जाना अंत नहीं, बल्कि खुद को नई पहचान देने की एक शुरुआत है। जो लोग हमें बीच राह में छोड़ जाते हैं, वे भले ही हमारे साथ मंजिल तक न पहुँचें, लेकिन वे हमें जीवन के ऐसे सबक और तजुर्बे दे जाते हैं जो हमें भीतर से और अधिक मजबूत बना देते हैं।
यह कविता हमें सिखाती है कि दुख के उन काले बादलों और बारिश के बीच, जब हम अपना हाथ थामना सीख लेते हैं, तो बेवफाई का दर्द धीरे-धीरे हमारी आज़ादी और हमारे स्वाभिमान में बदल जाता है। अतः, अपनी खुशियों को किसी और पर निर्भर रखने के बजाय, उन्हें अपने भीतर खोजना ही सच्ची जीत है। आशा है कि यह कविता आपको भी मुश्किल हालातों में हार न मानकर, खुद को एक नई उम्मीद के साथ जोड़ने का हौसला देगी।
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1 Comments
उसने दामन क्या छोड़ा,
ReplyDeleteमैंने खुद को थाम लिया,
उसकी बेवफाई को मैंने,
अपनी आज़ादी का नाम दिया...!👌❤️
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