★ 'आशा' की नई किरण ★

तेरी खामोशी की आवाज़, मेरे दिल तक आई है,

हाँ सच है कि मैंने ही, ये दूरियाँ बढ़ाई हैं...!


मैं सामान लाता रहा, घर भरने की चाहत में,

पर देख न सका कि तेरी, आँखों में तन्हाई है...!

वो फ़ोन की दुनिया झूठी थी, मैं उसमें खो गया था,

तेरा थका हुआ चेहरा, मुझे अब दिखाई दी है...!


भूल गया था मैं कि सुकून, अपनों के पास होता है,

पैसों की इस दौड़ में, बस वक्त का ह्रास होता है...!

तू घर की दीवार नहीं, मेरी दुनिया की जान है,

मेरे वजूद की 'आशा', तू ही मेरी परछाईं है...!


अब 'मैं' और 'तुम' नहीं, अब 'हम' बनकर जिएँगे,

वफा की इस नई सुबह ने, एक अँगड़ाई ली है...!

सुलझाऊँगा वो उलझनें, जो अनकही रह गई थीं,

मिटाऊँगा वो दूरियाँ, जो खामोशी कह गई थीं...!


हाथ थाम कर तेरा, फिर उन्हीं गलियों में चलेंगे,

जहाँ खुशियाँ हमारे इंतज़ार में, पलकें बिछाए बैठी थीं...!

तेरे सपनों की उड़ान अब, मेरी ज़िम्मेदारी है,

ये रिश्ता निभाने की नहीं, साथ जीने की साझेदारी है...!


धूप हो या छाँव, अब हर सफर साथ तय करेंगे,

पुराने जख्मों पर अब, प्यार का मरहम भरेंगे...!


मिटा कर अंधेरे पुराने, एक नई कसम खाते हैं,

चलो 'आशा' की छाँव में, हम अपना घर बसाते हैं...!




🌸 शुक्रिया 🌸


आपकी अपनी 🌹 

Ahasas Dayri 📕



● इस कविता का कौन सा हिस्सा आपके दिल को सबसे ज्यादा छू गया और क्यों ?


● "फ़ोन की दुनिया झूठी थी, मैं उसमें खो गया था"— क्या आपको भी लगता है कि मोबाइल ने अपनों के बीच खामोशी बढ़ा दी है ?


● आपके हिसाब से एक मकान को 'घर' बनाने के लिए सबसे जरूरी चीज़ क्या है ?


● क्या एक रिश्ते में अपनी गलती मान लेना उसे टूटने से बचाने का सबसे सही तरीका है ?


● "ये रिश्ता निभाने की नहीं, साथ जीने की साझेदारी है"— इस पंक्ति पर आपकी क्या राय है ?


● आपके जीवन में 'आशा' का क्या महत्व है? क्या कभी किसी छोटी सी पहल ने आपके किसी पुराने रिश्ते में नई जान फूँकी है ?


● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।