★ वो बारिश वो ज़िद और मैं ★
हाथों में हाथ होने से,
कोई साथ नहीं होता,
जो रूह न समझे,
वो हमराह नहीं होता...!
छोड़ा जो उसने हाथ,
तो बस भरोसा टूटा था,
वो शख्स तो कब का,
मेरे अंदर से छूटा था...!
उस रात घटाएँ नहीं,
मेरी यादें बरस रही थीं,
मैं ज़मीं पर बिखरी थी,
और उसकी ज़िदें अकड़ रही थीं...!
एक बार मुड़कर देखता,
तो शायद मंज़र बदल जाता,
मेरे बिखरते वजूद को,
उसका एक लम्हा सँभाल जाता...!
पर वो चला गया चुपचाप,
जैसे कोई गुनाह न हो,
ऐसे मुड़ा कि जैसे पीछे,
कोई तबाह न हो...!
सवालों के भँवर में मुझे,
तन्हा छोड़ गया वो,
ज़िंदा तो थी मैं,
पर जीने की तमन्ना तोड़ गया वो...!
सर्दी से बदन काँपा,
पर रूह सुलगती रही,
हैरानी थी कि मौत के साये में,
ज़िंदगी मचलती रही...!
जिसे उम्र भर का घाव समझा,
वो तो मरहम की परछाईं थी,
उस काली भीगी रात में,
मुझे अपनी असलियत दिखाई दी...!
अब जाना कि कुछ लोग,
मंज़िल तक साथ नहीं देते,
वो सिर्फ तजुर्बा देते हैं,
कभी हाथ नहीं देते...!
उसने दामन क्या छोड़ा,
मैंने खुद को थाम लिया,
उसकी बेवफाई को मैंने,
अपनी आज़ादी का नाम दिया...!
खोया नहीं उसे मैंने,
बस एक वहम मिटाया है,
उस रात मरकर मैंने,
खुद को ज़िंदा पाया है...!
🌸 शुक्रिया 🌸
आपकी अपनी 🌹
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● बेवफाई को आज़ादी का नाम देना— इस सोच के बारे में आपकी क्या राय है ?
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1 Comments
उसने दामन क्या छोड़ा,
ReplyDeleteमैंने खुद को थाम लिया,
उसकी बेवफाई को मैंने,
अपनी आज़ादी का नाम दिया...!👌❤️
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