★ मैं और मेरी डायरी ★
दोस्तो, जीवन की भागदौड़ में हम बहुत कुछ पीछे छोड़ आते हैं, लेकिन कुछ बातें और अहसास ऐसे होते हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ते। 'मैं और मेरी डायरी' कविता इसी जज्बात की एक खूबसूरत दास्तान है। यह कविता उस समय की यात्रा है जब हम अपने दिल की उन अनकही बातों को पन्नों पर उतारते हैं जिन्हें किसी और से कहना मुमकिन नहीं होता। डायरी केवल स्याही और कागजों का मेल नहीं है, बल्कि यह हमारे बचपन की मासूमियत, उन यादों और उन पलों का एक आईना है, जिन्हें हम कभी भी दोबारा जी सकते हैं। यह कविता हमें याद दिलाती है कि कैसे एक पुरानी डायरी खोलते ही हम फिर से उन गलियों में पहुँच जाते हैं, जहाँ हमारा बचपन आज भी मुस्कुरा रहा है...!
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मैं और मेरी डायरी,
अक्सर बातें करते हैं,
सूरज ढले या सुबह खिले,
अहसासों से पन्ने भरते हैं,
चलो आज उन पन्नों की,
ज़रा धूल झाड़ते हैं,
छिपे हुए जज़्बातों को,
फिर से आवाज़ मारते हैं।
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पहला पन्ना खुला,
तो महक उठी वो यादों की गुल्लक
अलमारी के कोने में दबी,
वो एक पुरानी डायरी मिली,
पन्ना पलटी तो बचपन की,
वो कागज़ की कश्ती फिर से चली,
कहीं स्याही के धब्बे हैं,
तो कहीं लकीरें टेढ़ी-मेढ़ी,
उसमें कैद है मेरे स्कूल का बस्ता,
बचपन की वो गलियां,
वो मिट्टी की खुशबू,
वो बेपरवाह सा मुस्कुराना,
दोस्तों के साथ मिलकर,
छोटी बातों पर घर सर पर उठाना,
डायरी के पन्नों में आज भी वो बचपन ज़िंदा है,
जो वक़्त के पिंजरे से आज़ाद,
एक खुला परिंदा है,
'गूंगी गुड़िया' कहते थे सब,
ऐसी थी मासूम सूरत,
दुनिया से रिश्ता कम था,
किताबों से यारी गहरी थी,
मेरी दुनिया बस मेरे मन की,
चौखट तक ही ठहरी थी।
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दूसरा पन्ना खुला तो,
फिर वक्त ने करवट ली,
और शहर ने हमें पुकारा,
छूटा वो आँगन,
छूटा वो सुकून का किनारा,
नए किरदार मिले, नए यार मिले,
नई जवानी आई,
पर दिल के सबसे करीब,
बस एक डायरी ही समाई,
यहीं से शुरू हुई वो बात,
जो दुनिया से अनजानी है,
मेरी हर एक सिसकी और मुस्कान,
इस कागज़ की दीवानी है,
अब लफ़्जों से प्यार है मुझे,
और कविताओं का खुमार,
दिल के जज़्बात कागज़ पर,
अब होते हैं बेशुमार ,
जो बातें कह न सकी किसी से,
वो सब यहाँ लिख देती हूँ,
मैं अपनी पूरी कायनात,
इन पन्नों में समेट लेती हूँ।
यहाँ न कोई टोकता है,
न कोई मज़ाक उड़ाता है,
मेरी हर सच इन लकीरों में,
सुकून पाती है,
वक्त की धूल जमी हो चाहे बरसों पुरानी,
खोलूँ पन्ना कोई,
तो फिर से जी उठती हूँ अपनी ही कहानी।
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और फिर एक पन्ने पर रुका हाथ,
जहाँ नाम लिखा है तुम्हारा,
वो इंसान जो मेरी,
हर उलझन में बना मेरा सहारा,
तुम्हारी बातों की मिठास,
इन अल्फाजों में आज भी ताज़ा है,
जैसे बंद कमरे में खुला,
यादों का कोई दरवाज़ा है,
वो साथ बिताई शामें,
वो बिन कहे सब समझ जाना,
डायरी में आज भी महकता है,
तुम्हारा वो मुस्कुराना,
तुम महज़ एक याद नहीं,
इन पन्नों की रूह बन गए हो,
मेरी दास्तां के सबसे खूबसूरत,
और ज़रूरी पहलू बन गए हो...!
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👉 शुक्रिया 👈
आपकी अपनी 🌹
Ahasas Dayri 📕
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कुछ अनकहे सवाल (आपका नजरिया):-
इस कविता को लिखने के बाद, मेरे मन में पाठकों के लिए कुछ सवाल है कुछ सवाल हैं:-
● आपको मेरी कहानी कैसी लगी ?
● क्या आपके पास भी ऐसी कोई पुरानी डायरी है, जिसके पन्ने पलटते ही आप फिर से बचपन की उन गलियों में पहुँच जाते हैं ?
● अक्सर जो बातें हम दुनिया से नहीं कह पाते, उन्हें कागज पर उतारने के बाद मिलने वाले उस सुकून को आपने कभी महसूस किया है ?
● आपकी ज़िंदगी की डायरी का वो 'खूबसूरत पहलू' कौन सा है, जिसका नाम आज भी पन्नों पर महकता है ?
● नीचे कमेंट में अपनी डायरी से जुड़ा कोई छोटा सा किस्सा या अपना अहसास साझा करें।
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लेखिका की कलम से (निष्कर्ष):-
अंत में, यह कविता हमें यह सिखाती है कि डायरी लिखना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि खुद से जुड़ने का एक जरिया है। समय के साथ लोग बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं और प्राथमिकताएँ भी, लेकिन डायरी के पन्नों में कैद यादें हमेशा ताज़ा रहती हैं। इसमें लिखे हर शब्द में वह सुकून है जो हमें दुनिया की भीड़ से अलग खुद की रूह से मिलाता है। चाहे वह बचपन की कोई मासूम शरारत हो या किसी खास इंसान का दिया हुआ वह प्यारा सा नाम, यह डायरी उन अनमोल अहसासों को हमेशा सुरक्षित रखती है। यह हमें बताती है कि हमारी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत पन्ने वे हैं, जहाँ हमने बिना किसी डर या झिझक के, अपनी रूह को शब्दों के जरिए बयां किया है।





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