★ 'आशा' की गूँज ★

 सजाया घर जिसे मैंने, वो सिर्फ एक मकान नहीं,

थकान शामिल है इसमें मेरी, ये सिर्फ मुकाम नहीं।

तुम अपनी फोन की दुनिया में यूँ ही खोए रहते हो,

हम पास होकर भी साथ हैं, ये अब गुमान नहीं।


सम्मान कोई तोहफा नहीं, जो साल में एक बार मिले,

जो रूह में न उतरे हर रोज़, वो सम्मान नहीं।

मेरे 'फ़र्ज़' को बस 'कर्तव्य' का ही नाम मत देना,

मैं भी एक इंसान हूँ, महज़ कोई बेज़बान नहीं।


ऊँचे महलों की कोई खास चाहत नहीं है मुझे,

पर तुम्हारी उपेक्षा सहे, अब ये जान नहीं।

मेरे ख़्वाबों को पैरों तले यूँ न कुचला करो तुम,

रिश्ता बराबरी का है, ये कोई फरमान नहीं।


मेरी खामोशी में दफन हैं हज़ारों गहरे सवाल,

बाहर से शांत हूँ, पर अंदर मचे तूफान हैं ।

प्यार बहुत है, मगर 'आदर' की कमी खलती है,

जहाँ इज़्ज़त न हो, समझो वो सच्चा जहान नहीं।


चलो फिर से "हम" बनें, छोड़ें ये "मैं" और "तुम",

रिश्ता सिर्फ एक निभाए, ऐसा कोई अरमान नहीं...!


🌸 शुक्रिया 🌸 


आपकी अपनी 🌹 

Ahasas Dayri 📕


● एक रिश्ते में आपके लिए सबसे ज्यादा मायने क्या रखता है—प्यार या इज्जत ?


● क्या आपको भी लगता है कि फोन की वजह से लोग एक ही कमरे में बैठकर भी एक-दूसरे से दूर हो गए हैं ? (हाँ/नहीं)


● आपके हिसाब से एक 'मकान' को 'घर' कौन सी चीज बनाती है ?


● क्या आप भी कभी-कभी अपनी बात कहने के बजाय चुप रहना पसंद करते हैं ? 


● क्या एक मजबूत रिश्ते में दोनों का हक बराबर होना चाहिए, या किसी एक को झुकना पड़ता है ?


● कविता की कौन सी लाइन आपको अपने दिल के सबसे करीब लगी ?


● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।