__________________________ सुमित्रानंदन पंत

सुमित्रानंदन पंत

सुमित्रानंदन पंत 

जीवन परिचय और साहित्यिक सफर

हिंदी साहित्य जगत में ‘छायावाद’ एक ऐसा दौर था जिसने हिंदी कविता को पुरानी परंपराओं और बंधे-बंधाए नियमों से बाहर निकालकर नई भावनाओं, कोमलता और कल्पना की ऊँचाइयाँ दीं। छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों—जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत—में पंत जी का स्थान बहुत खास है। उन्हें हिंदी कविता में ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ और ‘युग प्रवर्तक’ माना जाता है। उनकी कविताओं के कोमल भावों, सुंदर शब्दों और प्रकृति के जीवंत चित्रों ने हिंदी साहित्य को बहुत समृद्ध किया है।

1. जन्म और बचपन

इस महान कवि का जन्म 20 मई सन 1900 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा (अब बागेश्वर) जिले के कौसानी गाँव में हुआ था। यह जगह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। उनके बचपन का नाम गुसाईं दत्त था। उनके पिता का नाम पंडित गंगादत्त पंत था, जो कौसानी के एक चाय बागान में मैनेजर के तौर पर काम करते थे।

विभाता का एक दुखद नियम उनके जन्म के साथ ही जुड़ा था। उनके पैदा होने के मात्र छह घंटे बाद ही उनकी माँ (सरस्वती देवी) का निधन हो गया। माँ का प्यार न मिलने के कारण उनकी परवरिश उनकी दादी और पिता की देखरेख में हुई।

कौसानी की गोद में, जहाँ चारों ओर बर्फ से ढकी हिमालय की पहाड़ियाँ, ऊंचे-ऊंचे पेड़, कल-कल करते झरने और सुंदर रास्ते थे, बालक गुसाईं दत्त का बचपन बीता। यही कारण है कि प्रकृति ने ही उनकी माँ की कमी को पूरा किया और उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। यही प्राकृतिक माहौल आगे चलकर उनकी कविताओं की सबसे बड़ी ताकत बना।

2. शिक्षा और नाम बदलना

सुमित्रानंदन पंत की शुरुआती पढ़ाई कौसानी के ही एक स्कूल में हुई। इसके बाद, ग्यारह साल की उम्र में उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा के गवर्नमेंट हाईस्कूल में भेजा गया। अल्मोड़ा के माहौल ने उनकी सोच को और बढ़ाया।

अल्मोड़ा में पढ़ते समय उन्होंने महसूस किया कि उनका असली नाम ‘गुसाईं दत्त’ उनकी कविता लिखने के शौक और उनके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता। रामायण के लोकप्रिय पात्र लक्ष्मण के चरित्र से प्रभावित होकर और अपने भीतर के सौंदर्य को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘सुमित्रानंदन’ रख लिया।

अल्मोड़ा से स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए वाराणसी (काशी) गए और वहाँ ‘क्वींस कॉलेज’ में दाखिला लिया। काशी के बाद वे इलाहाबाद आ गए और प्रसिद्ध ‘म्योर सेंट्रल कॉलेज’ में पढ़ाई करने लगे।

3. स्वतंत्रता आंदोलन और सोच में बदलाव

जब सुमित्रानंदन पंत इलाहाबाद के कॉलेज में पढ़ रहे थे, तब देश में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन (1921) चल रहा था। गांधीजी के विचारों, देशप्रेम और आज़ादी की पुकार से उनका युवा दिल इतना भर आया कि उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने कॉलेज से अपना नाम कटवा लिया और देश की सेवा तथा स्वतंत्र रूप से साहित्य लिखने को अपने जीवन का मुख्य रास्ता बना लिया।

इसके बाद उन्होंने घर पर ही रहकर संस्कृत, बंगाली, अंग्रेजी और हिंदी साहित्य की गहरी पढ़ाई की। उनके विचारों में समय के साथ बदलाव आया। पहले वे पूरी तरह प्रकृति और रहस्यवाद से जुड़े थे, लेकिन बाद में वे साम्यवादी विचारक कार्ल मार्क्स और महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित हुए। इससे उनकी रचनाओं में आम आदमी के दुख-दर्द और सच्चाई की झलक भी मिलने लगी। जीवन के आखिरी समय में वे महर्षि अरविंद (Sri Aurobindo) के अध्यात्म और दर्शन से बहुत प्रभावित हुए।

4. साहित्यिक यात्रा और रचनाएँ

पंत जी ने बहुत कम उम्र से ही कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था। मात्र सात साल की उम्र में स्कूल में कविता सुनाने पर उन्हें इनाम मिला था। साल 1915 से उन्होंने नियमित रूप से साहित्य लिखना शुरू कर दिया। जब उनकी कविताएँ मशहूर पत्रिका ‘सरस्वती’ में छपीं, तो देश के बड़े-बड़े लेखक उनकी ओर आकर्षित हुए।

उनकी साहित्यिक यात्रा को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है—छायावादी दौर, प्रगतिवादी दौर और दार्शनिक दौर।

प्रमुख किताबें और रचनाएँ:-

छायावादी रचनाएँ:- वीणा (1927), पल्लव (1928), ग्रंथी (1920), और गुंजन (1932)। इनमें से पल्लव को छायावाद का 'घोषणा-पत्र' माना जाता है।

प्रगतिवादी रचनाएँ:- युगांत (1936), युगवाणी (1939), और ग्राम्या (1940)। इन किताबों में गाँव की हालत, मजदूरों और गरीबों के प्रति सहानुभूति दिखाई गई है।

दार्शनिक रचनाएँ:- स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, उत्तरा, कला और बूढ़ा चाँद, चिदंबरा और उनका बड़ा महाकाव्य लोकायतन।

नाटक:- उन्होंने ज्योत्सना नाम से एक सुंदर नाटक भी लिखा है।

5. कार्यक्षेत्र और जीवन के अन्य काम

लिखने के साथ-साथ पंत जी ने कई सरकारी और सांस्कृतिक संस्थाओं में भी काम किया।

साल 1950 से 1957 तक वे आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) में मुख्य सलाहकार रहे और वहाँ साहित्यिक कार्यक्रमों को सही दिशा दी।

उन्होंने कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए इलाहाबाद में ‘कला संस्कृति केंद्र’ और ‘लोकायतन’ जैसी संस्थाओं को बनाने में भी अहम भूमिका निभाई।

हिंदी साहित्य जगत में उनका इतना सम्मान था कि उन्होंने ही अपने समय के एक युवा और उभरते अभिनेता (जो आगे चलकर महानायक बने) अमिताभ बच्चन का नाम ‘अमिताभ’ रखा था।

6. पुरस्कार और सम्मान

सुमित्रानंदन पंत को उनकी बेहतरीन रचनाओं के लिए देश के बड़े-बड़े सम्मान मिले:-

साहित्य अकादमी पुरस्कार:- साल 1960 में उनकी किताब ‘कला और बूढ़ा चाँद’ के लिए उन्हें यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला।

पद्मभूषण:- साहित्य के क्षेत्र में उनके शानदार योगदान के लिए साल 1961 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से नवाजा।

ज्ञानपीठ पुरस्कार:- साल 1968 में उनकी कविताओं के संकलन ‘चिदंबरा’ के लिए उन्हें भारत के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे हिंदी साहित्य के पहले कवि थे।

इसके अलावा उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

7. लिखने की शैली और विशेषताएँ

सुमित्रानंदन पंत की कविता की सबसे बड़ी खूबी उनका प्रकृति से बेइंतहा प्यार है। उन्होंने प्रकृति को सिर्फ बाहर की सुंदरता के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसमें जान डालकर उसे इंसानी भावनाओं से जोड़ दिया। महान कवि निराला ने उनके बारे में कहा था कि पंत जी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे अपनी बातों को बहुत सुंदर उपमाओं से सजाकर बेहद मधुर और कोमल बना देते हैं।

उनकी भाषा बहुत साफ, कोमल और संगीत जैसी मीठी थी। उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को एक नई मिठास और कोमलता दी, जो उससे पहले केवल ब्रजभाषा में ही महसूस की जाती थी। उनकी कविताएँ पढ़ते ही पाठक की आँखों के सामने पूरा नज़ारा जीवंत हो उठता था।

8. निधन

हिंदी साहित्य को अपनी कविताओं से सजाने वाले, प्रकृति के सच्चे प्रेमी और शब्दों के जादूगर सुमित्रानंदन पंत का निधन 28 दिसंबर 1977 को हुआ। भले ही वे शारीरिक रूप से इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी अमर रचनाएँ और हिंदी साहित्य के लिए किया गया उनका काम हमेशा याद रखा जाएगा। कौसानी में उनके पुराने घर को आज ‘सुमित्रानंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ (संग्रहालय) बना दिया गया है, जो उनके जीवन और साहित्य की याद दिलाता है।

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